"सामाजिक ताना-बाना"
मेरे द्वारा, मनोज भट्ट जी की यह एक रचना, आज के युवा कामकाजी बच्चों को समर्पित है और साथ ही उनके अंतरमन को जगाने का प्रयास है, जो अनजाने में अपने माता-पिता को भावनाओं के नाम पर, पास तो बुलाते हैं, पर अपनी जीवनशैली की सीमाओं में उन्हें बाँध देते हैं।
- यह कविता एक आईना है, जिसमें हर बेटे-बेटी को अपनी भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उसकी असली तस्वीर देखनी चाहिए।
- यह कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, यह एक तपस्वी जीवन की गाथा है, उन माँ-बाप की, जिन्होंने अपने बच्चों के लिए हर सुख त्यागा, हर पीड़ा सहा, और हर क्षण को उनके भविष्य की नींव में बदल दिया।
- यह कविता एक आह्वान है, उस सच्चे रिश्ते की ओर, जहाँ माँ-बाप केवल ज़रूरत नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा हैं। जहाँ उनका साथ केवल सहारा नहीं, बल्कि आत्मबल का आधार है।
- यह कविता कोई शिकायत नहीं, कोई आरोप नहीं, यह एक संत की वाणी है, जो प्रेम और मर्यादा के साथ कहती है....
"माँ-बाप को अपनाओ, पर शर्तों के साथ नहीं।
सम्मान दो, पर दिखावे के लिए नहीं।
प्रेम दो, पर स्वार्थ के तले नहीं।" क्योंकि
"माँ-बाप की मुस्कान में ही है हमारा कल,
और उनकी छाँव में ही है जीवन का हल।"
आइए, इस कविता के माध्यम से हम अपने भीतर की उस आवाज़ को सुनें, जो कहती है...
अपने प्रभु से माँ-बाप की पुकार...
अपने बच्चों के, छोटे-छोटे सपनों को सींचा,
अपनी हर चाहत को, खामोशी से खींचा।
उनकी खुशी में, सारा जीवन आहूत किया,
और अपने हर तप को, प्यार का नाम दिया।
पिता ने अक्सर, पसीने से घर को साधा था,
माँ ने भी कभी, निवाला आँचल में बांधा था।
बच्चों के बचपन की, हर ठोकर पर मुस्कराए,
अपने आँसू पी कर भी, बच्चों के खातिर इठलाए।
फिर एक दिन बेटा बोला, “अब पास रहो हमारे ”
फिर बेटी भी बोली दूजे दिन “ चलो संग घर मेरे ”
हम दोनों ने दिल से सोचा, अब सुकून मिलेगा,
आगे दोनों का बुढ़ापा प्रेम की छाँव में बीतेगा।
फिर कुछ दिन बीते वक्त ने,अपना रंग दिखाया,
जब स्नेह की जगह, शर्तों ने अपना घर बसाया।
हर काम में एक पाबंद, चुपचाप वहीं छिपा था,
हर बात में एक अनकहा, कहीं अनुबंध छिपा था।
“ये मत कहो,” बेटा टोके ,"वो मत करो,” बेटी रोके,
लगने लगा शीघ्र जैसे, नींद खुली हो बहु दिन सोके।
उनकी मर्यादा के नाम पर, नित नई नई दीवारे उठीं,
तड़प उठे हम माँ-बाप, जब अंतर्मन की सांसे घुटीं।
फिर शुरू हुआ आपस में, एक नया दौर कसैला,
खतम हुआ सब स्नेह, और मोह का मेला जोला।
जैसे बीते एक एक दिन अब, नई परीक्षा की तैयारी में.
रात कटे हम दोनों की, मन के सन्नाटे के कोलाहल में।
लगने लगा अब तो हम, जैसे पुराना बेकाम का सामान,
हम पी रहे थे रोज रोज,जैसे जहर के घूंट सा अपमान।
टूटे सारे सपने अपने, मन के सारे कल्पित ख्वाब,
ताना बाना सब बिखर गया, बुझ गई मन की आब।
राजा बनेंगे हम और सोचा था, बच्चे ताकत हमारी,
देखो आज उलट तस्वीर, हम बन गए उनके दरवारी।
हे प्रभु, हे विधाता मुक्त करो अब, ऐसा बंधन अति भारी.
सबके संग चरितार्थ करो, न काहू से दोस्ती, न काहू से यारी।
क्या बताएं, और क्यों बताएं, उन्हें अब महत्व अपना.
उनकी आँखों में है, उनके अनुभव का प्रकाश अपना।
फिर भी उनके लिए है, हमारे आशीर्वाद का विश्वास,
प्रभु अब बहुत हुआ बस, अब आपके चरणों की आस।
सच है कि उनके बिना, रिश्तों की डोर बिखरती है,
उनके बिना अब हर दिवाली ,फीकी अधूरी लगती है।
बेटा-बेटी, सुनो ये पुकार, मत करो प्रेम का व्यापार,
बिना शर्त दिया जो हमने ,समझ न सके तुम उसका सार।
प्रेम दो, सम्मान दो, मत बाँधो सीमाओं के जाल में,
न बांधों माँ-बाप को अपने, नियमों के जंजाल में।
उनकी ही मुस्कान में है तुम सबका आने वाला कल,
उनकी ही छाँव में होगा, तुम सबके जीवन का हर हल।
जब कभी वे थक जाएँ, उन्हें सहारा दो तन का,
जब वे चुप हों तो, उन्हें पुकारा दो अपने मन का।
यही है रिश्तों की सच्ची परिभाषा की ताना,
यही है जीवन की सबसे सुंदर भाषा की बाना।
रचना...मनोज भट्ट, कानपुर।
प्रस्तुति... गायत्री भट्ट,

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
“आपकी टिप्पणी हमारे लिए अमूल्य है – कृपया विचार साझा करें।”