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पढ़ें पारिवारिक एवं सामाजिक सरोकार से संबंधित लेख

व्यक्तिगत लाभ से सामूहिक चेतना तक | From Me to We

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स्वार्थ से सहयोग की ओर: हृदय से शुरू होने वाला परिवर्तन एक नई दिशा की आवश्यकता आज की दुनिया में, जहां प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत लाभ की होड़ ने मानव संबंधों को जटिल बना दिया है, एक साधारण सत्य उभरता है: "स्वार्थ को सहयोग में बदलना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। और शायद, परिवर्तन की शुरुआत बाहर नहीं, हमारे अपने हृदय से ही होगी।"  यह विचार न केवल एक दार्शनिक मंत्र है, बल्कि एक व्यावहारिक मार्गदर्शन भी, जो हमें बताता है कि सच्चा बदलाव बाहरी दुनिया की बजाय हमारे आंतरिक जगत से आरंभ होता है। हमारी आधुनिक सभ्यता में, स्वार्थ ने हमें अलग-थलग कर दिया है। लोग अपने लाभ के लिए दूसरों को नजरअंदाज करते हैं, जिससे समाज में असमानता, संघर्ष और अकेलापन बढ़ता जा रहा है। लेकिन क्या हम इस चक्र को तोड़ सकते हैं ? हां, यदि हम सहयोग की शक्ति को अपनाएं। सहयोग न केवल सामाजिक सद्भाव लाता है, बल्कि व्यक्तिगत विकास और सामूहिक प्रगति का आधार भी बनता है।  इस लेख में, हम इस विचार की गहराई में उतरेंगे, विभिन्न उदाहरणों, कहानियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के माध्यम से समझेंगे कि कैसे स्वार्थ को सहयोग में बदलकर...

लड़कियों की किशोरावस्था.भाग 1 एक उम्र, अनेक दिशाएँ : सपने और आत्मसम्मान One Age, Many Directions: Adolescent Girls, Identity, Dreams & Self-Worth

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 लड़कियों की किशोरावस्था..भाग 1 एक  उम्र, अनेक दिशाएँ, सपने और आत्मसम्मान लड़कियों की किशोरावस्था, जीवन का वह दौर है जहाँ उम्र तो कुछ सालों में बदल जाती है, लेकिन भीतर चलने वाला परिवर्तन कई वर्षों तक असर छोड़ता है। यह वह समय है जब एक लड़की बचपन की सरलता से निकलकर धीरे-धीरे वयस्क दुनिया की जटिलताओं की ओर बढ़ती है। इस सफर में उसके साथ होते हैं, अनगिनत सवाल, अनकहे डर, छोटे-छोटे सपने और बड़ी-बड़ी उम्मीदें।   अक्सर समाज इस उम्र को “समस्या की उम्र” कहकर देखता है, जबकि सच यह है कि यह संभावनाओं की उम्र है । अगर इस समय सही समझ, सहारा और विश्वास मिले, तो यही किशोरियाँ कल एक संवेदनशील, आत्मनिर्भर और जागरूक समाज की नींव बनती हैं।   यह लेख उन सभी किशोरियों के लिए है जो कभी आईने में खुद से पूछती हैं.. मैं कौन हूँ ?   मेरी जगह कहाँ है ?   क्या मैं जैसी हूँ, वैसी ठीक हूँ ?   और उन अभिभावकों व शिक्षकों के लिए भी, जो इन सवालों को समझना चाहते हैं।   1. किशोरावस्था क्या सच में कठिन होती है ? किशोरावस्था को अक्सर विद्रोह, ज़िद और अस्थिरता...

गुस्सा, एकांत और बेचारा पति English: Anger, Solitude and the Poor Husband

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गुस्सा, एकांत और बेचारा पति: एक विस्तृत पारिवारिक हास्य-व्यंग्य कथा दार्शनिक का परिचय हमारे मोहल्ले में एक ऐसे दार्शनिक रहते थे, जिनका नाम सुनते ही लोग हंसने लगते थे, श्री हरिशंकर पंडित ‘अनुभवी’।  अब ‘अनुभवी’ नाम कैसे पड़ा, यह एक अलग कहानी है, लेकिन संक्षेप में कहें तो उन्होंने शादी के 25 साल पूरे कर लिए थे, और वह भी जीवित अवस्था में... जी हां, जीवित! क्योंकि शादी के बाद कई पुरुषों की आत्मा तो पहले ही दफन हो जाती है, लेकिन पंडित जी की आत्मा न सिर्फ जीवित थी, बल्कि वह मोहल्ले के हर नये दूल्हे को जीवन का मंत्र देने के लिए तैयार रहती थी।एक "अनुभवी आत्मा"... लोग कहते थे, “पीएचडी कर लो, आईएएस बन जाओ, योग गुरु बन जाओ, पर पंडित जी कहते थे कि असली योग्यता चाहिए तो 20 साल शादी निभाओ।” पंडित जी फिर कहते कि "जिसने शादी के दो दशक पूरे कर लिए,वो ठसक से जीवन जीता है।"  पंडित जी ने एक फिलॉसफर की तरह जीवन का एक महान सिद्धांत खोजा था, जो वे हर शादीशुदा जोड़े को मुफ्त में बांटते थे।  वह सिद्धांत था: “ पुरुष गुस्से में एकांत ढूंढता है…लेकिन स्त्री गुस्से में पति ढूंढती है ।”  पहले त...

किशोरावस्था: नाजुक उम्र, मजबूत भविष्य | Adolescence: Fragile Age, Strong Future

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  किशोरावस्था की लड़कियां,  एक नाजुक उम्र...  किशोरावस्था जीवन की उस संवेदनशील अवस्था का नाम है जहां सब कुछ बदलता नजर आता है। यह केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं है, बल्कि एक ऐसा मोड़ है जहां मन, शरीर और सोच तीनों एक साथ तेज गति से परिवर्तित होते हैं।  एक किशोरी के जीवन में यह समय अनेक सवालों, सपनों और तमाम अनजाने डर के साथ साथ, अनंत संभावनाओं से भरा होता है। कभी वह खुद को अपार आत्मविश्वास से भरी महसूस करती है, तो कभी बिना किसी स्पष्ट कारण के असमंजस और असुरक्षा की गिरफ्त में आ जाती है। यह सब स्वाभाविक है, क्योंकि यह विकास की प्रक्रिया का हिस्सा है।  लेकिन कटु सत्य यह है कि समाज में अक्सर किशोरियों को इन बदलावों के लिए तैयार नहीं किया जाता। इसके बजाय, उन्हें निर्देश दिए जाते हैं कि क्या पहनना है, कैसे बोलना है, कितना हंसना है, क्या सोचना है। लेकिन बहुत कम लोग उनसे कहते हैं कि तुम कौन हो, तुम क्या बनना चाहती हो, और तुम्हारे सपनों का आकार कितना बड़ा हो सकता है। "सामाजिक ताना-बाना" ब्लॉग के माध्यम से यह लेख उसी खाली जगह को भरने का एक छोटा सा प्रयास है। हम हर किशोरी से कहन...

जेन्जी (Gen Z): नई सोच, नई जिम्मेदारी और उज्ज्वल भविष्य की ओर....Gen Z: New Thinking, New Responsibility & a Bright Future

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जेन्जी (Gen Z): नई सोच, नई जिम्मेदारी और उज्ज्वल भविष्य की ओर हर युग अपने साथ एक नई चेतना लेकर आता है। इतिहास गवाह है कि समाज में सबसे बड़े परिवर्तन नई पीढ़ियों ने ही किए हैं। चाहे स्वतंत्रता आंदोलन हो, सामाजिक सुधार हों या तकनीकी क्रांति, हर मोड़ पर युवाओं ने दिशा तय की है। आज के युग में जिस पीढ़ी की चर्चा सबसे अधिक हो रही है, वह है Generation Z, जिसे हम प्यार से “जेन्जी” कहते हैं।यह पीढ़ी केवल उम्र से युवा नहीं, बल्कि सोच से भी अग्रणी है।1997 से 2012 के बीच जन्मी यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच पली-बढ़ी है।यह डिजिटल नेटिव्स हैं, यानी तकनीक इनके लिए सुविधा नहीं, बल्कि स्वभाव है। लेकिन यही वह बिंदु है जहाँ से एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है, क्या यह पीढ़ी तकनीक का उपयोग भविष्य निर्माण के लिए कर रही है, या स्वयं ही उसके जाल में उलझ रही है...? यह लेख इसी द्वंद्व को समझने, दिशा देने और Gen Z की शक्ति को पहचानने का प्रयास है।

जब सत्ता विवेक को नहीं सुनती: धृतराष्ट्र से आज तक Power vs Conscience: Lessons from Dhritarashtra and Sanjay

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धृतराष्ट्र और संजय: महाभारत के संवाद में सत्ता और विवेक का द्वंद्व लेख की शुरुआत करने से पूर्व लेखक जिम्मेदारी के साथ यहां एक बात स्पष्ट करना चाहता है कि पूरे लेख में जहां भी सत्ता का संदर्भ आया है, उसका तात्पर्य उस पक्ष से है जो शासक है। न कि किसी दल विशेष से। क्योंकि लेखक का मानना है कि जो भी सत्ता में आता है, उसकी कार्य शैली अलग अलग हो सकती है, किंतु "परिणाम" सदियों से वही "ढाक के तीन पात" जैसे रहते हैं... लेखक;-- मनोज भट्ट, कानपुर  -------------------------------------------------------------------- महाभारत केवल एक युद्धकथा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर चल रहे नैतिक संघर्षों, भावनात्मक उलझनों और सत्ता के समीकरणों का दार्शनिक दस्तावेज है। इसके पात्र समय-काल की सीमाओं से परे जाकर आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में जीवंत प्रतीकों की तरह उपस्थित हैं। वर्तमान समय में विशेष रूप से धृतराष्ट्र और संजय का संबंध, एक अंधे राजा और एक दिव्य दृष्टि संपन्न सलाहकार का संवाद, आज के भारत में सत्ता और विवेक के बीच के तनाव को उजागर करता है। सबसे महत्वपूर्ण तत्व ये है कि मह...