असफलता का डर और फिर से उठने की कला
असफलता का डर और फिर से उठने की कला (“लड़कियों की किशोरावस्था”: श्रृंखला भाग 10:) किशोरियों की समझ, साहस और सपनों की यात्रा पहली सुबह, पहला सबक सुबह जब सूरज निकलता है तो वह रात के अँधेरे का हिसाब नहीं माँगता। वह बस रोशनी बिखेर देता है। किशोरावस्था भी ऐसी ही है। यहाँ रातें लंबी लगती हैं, आँसू भारी लगते हैं, और गिरना बहुत आसान लगता है। पर हर सुबह एक नई संभावना लेकर आती है। यह भाग उसी संभावना का है। यह भाग असफलता का है, पर मातम का नहीं। यह डर का है, पर घुटने टेकने का नहीं। यह गिरने का है, पर पड़े रहने का नहीं। हम सब गिरते हैं। कोई परीक्षा में, कोई दोस्ती में, कोई प्रेम में, कोई सपने में। और दुनिया का हर समाज, हर देश, हर गली-नुक्कड़ लड़कियों के गिरने को कुछ ज़्यादा ही शोर से देखता है। इसलिए आज की बात सिर्फ तुम्हारी नहीं है। यह बात है काबुल की उस लड़की की जिसे स्कूल जाने से रोका गया। यह बात है सूडान की उस लड़की की जिसे कम उम्र में ब्याह के लिए कहा गया। यह बात है कोलंबिया की उस लड़की की जिसे फुटबॉल खेलने पर ‘लड़कों जैसी’ कहा गया। यह बात है टोक्यो की उस लड़की की जिसे हर सम...