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जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ?

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जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ? सामाजिक ताना-बाना के लिए एक विचारशील लेख किशोरावस्था वो उम्र है जब घर में सबसे ज़्यादा कहानियां बनती हैं और साथ ही सबसे ज़्यादा दरवाज़े भी घर के ही बंद होते हैं। कल तक जो बच्चा हर छोटी से छोटी बात, अपनों को बताने दौड़कर आता था, आखिर क्यों आज वही आंखें चुराता है, जवाब में "हम्म" बोलता है या कमरे का दरवाज़ा भिड़ा देता है।  और फिर माता-पिता के लिए बच्चों का ऐसा व्यवहार और बच्चे की यह चुप्पी, शोर से भी ज़्यादा डरावनी होती है। अब यहां उनके अंदर कई तरह के सवाल उठते हैं कि "क्या बच्चे की परिवरिश में हमसे कोई गलती हो गई ? क्या हमारा बच्चा हाथ से निकल रहा है या निकल गया? यह लेख इसी मानसिक द्वंद्व और शारीरिक संघर्ष को समझने और सुलझाने की कोशिश है। हम इस लेख में, किशोर मस्तिष्क, बदलते रिश्ते, संवाद के टूटने की वजहें और उसे जोड़ने के व्यावहारिक तरीके देखेंगे। 1. किशोरावस्था: विद्रोह नहीं, विकास का दूसरा नाम सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि किशोर का "बात न सुनना" हमेशा अनादर नहीं होता। शारीरिक और मानसिक परिवर्तन, एक स...

पैसे की समझ : छोटी उम्र, बड़ी सीख

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  पैसे की समझ : छोटी उम्र, बड़ी सीख (लेख श्रृंखला, लड़कियों की किशोरावस्था – भाग 9) अब तक आपने इस यात्रा में अपने सवालों को पहचाना है, अपनी पहचान को रिश्तों से अलग देखा है, घर में संवाद की हिम्मत जुटाई है, समाज की निगाहों के बीच अपनी राह खोजी है, शिक्षा को डिग्री से आगे समझा है, डिजिटल दुनिया में खुद को संभालना सीखा है, भावनाओं को अपनी ताकत माना है, और 'ना' कहने का साहस पाया है। आज हम बात करेंगे एक ऐसे विषय की जो अक्सर बड़ों का माना जाता है, पर असल में तुम्हारी उम्र में ही इसकी नींव पड़नी चाहिए। वह विषय है पैसा। पैसा यानी तुम्हारी आज़ादी की चाबी। पैसा यानी तुम्हारे सपनों का ईंधन। पैसा यानी तुम्हारे फैसलों की ताकत। और सबसे बड़ी बात, पैसे की समझ सीखने के लिए तुम्हें 25 साल का होने का इंतजार नहीं करना। यह सीख आज से, अभी से शुरू होती है। 1. पैसा क्या है ? डर नहीं, एक औज़ार है हमारे आसपास पैसों को लेकर कई तरह की बातें होती हैं। कोई कहता है “पैसा हाथ का मैल है”, कोई कहता है “लड़कियों को पैसे की क्या जरूरत”, कोई कहता है “पैसे के पीछे मत भागो”। ये बातें आधी सच हैं। पूरा सच यह है कि प...

अकेलापन: जुड़ी हुई दुनिया में क्यों बढ़ रही हैं दूरियाँ ?

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  अकेलापन: जुड़ी हुई दुनिया में बढ़ती दूरियाँ... आज हम इतिहास के सबसे 'कनेक्टेड' युग में जी रहे हैं। एक क्लिक पर वीडियो कॉल, 24 घंटे चलने वाले ग्रुप चैट, सोशल मीडिया पर सैकड़ों दोस्त और रील्स की अनंत दुनिया। फिर भी विडंबना देखिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) 2023 में अकेलेपन को "वैश्विक जन स्वास्थ्य चिंता" घोषित कर चुका है।  अमेरिका के सर्जन जनरल ने तो इसे "दिन में 15 सिगरेट पीने जितना खतरनाक" बताया है। भारत भी इससे अछूता नहीं।   तो सवाल उठता है, जब हम पहले से ज्यादा जुड़े हैं, तो पहले से ज्यादा अकेले क्यों हैं ? इसका जवाब एक शब्द में नहीं है। अकेलापन अब सिर्फ व्यक्तिगत भावनात्मक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी और मनोवैज्ञानिक बदलावों का मिला-जुला नतीजा है। आइए इसकी परतें खोलते हैं और सबसे पहले  अकेलेपन को समझते हैं। 1. अकेला होना और अकेला महसूस करना सबसे पहले शब्दों का अंतर समझ लें, क्योंकि अकेला होना और अकेला महसूस करना,  एक नहीं हैं। अकेलापन (Loneliness) : यह किसी के लिए भी एक व्यक्तिगत भावना है। आप भीड़ में होकर भी अकेला महसूस कर सकते हैं। यह त...

‘ना’ कहना, एक महत्वपूर्ण साहसिक कदम...

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‘ ना’ कहना भी आत्मरक्षा है... (लड़कियों की किशोरावस्था – भाग 8) इस लेख की शुरूआत, सीबीआई के  पूर्व  डायरेक्टर जोगिंदर सिंह जी (1996-97) के एक लेख के दो बिंदुओं पर ध्यान देते हुए करते हैं... ना कहने के लिए हिम्मत चाहिए : जोगिंदर सिंह का मानना था कि जो लोग गलत काम के लिए या अपनी सीमाओं से अधिक काम के लिए मना करने से डरते हैं, वे बाद में ज्यादा मुश्किलों में फंसते हैं। 'ना' कहना सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि निडरता का संकेत है।। परेशानी कम करने का तरीका : उन्होंने अपने लेखों में बताया था कि यदि आप हर बात पर 'हाँ' कहते हैं, तो आप खुद के लिए अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं। सही समय पर और सही काम के लिए 'ना' कहने से आप अपनी आधी परेशानियां कम कर सकते हैं। किशोरियों की समझ, साहस और सपनों की यात्रा किशोरी, क्या तुमने कभी किसी की बात पर मुस्कुराते हुए “हाँ” कह दिया, जबकि अंदर से तुम्हारा मन पूरी ताकत से “ना” चिल्ला रहा था ? क्या किसी ने बिना पूछे तुम्हारे कंधे पर हाथ रख दिया, बालों में हाथ फेर दिया, या तुम्हारी जिन्दगी की कुछ निजी बातें पूछ डालीं ? क्या तुम सोचती हो कि “ना” कहने ...