स्वार्थ और लालच से बिखरता सामाजिक ताना-बाना:
स्वार्थ और लालच से बिखरता सामाजिक ताना-बाना...
वर्तमान की चुनौती और आगामी पीढ़ी की विरासत...
आज का युग भौतिक सुख-सुविधाओं का युग है। हर तरफ चमक-दमक, तेज गति, तुरंत सफलता और कम से कम मेहनत में अधिक से अधिक हैसियत पाने की होड़ मची हुई है। लेकिन इसी होड़ ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को चुपचाप चीरना शुरू कर दिया है।
जहां एक समय परिवार, समाज और राष्ट्र एक-दूसरे के सहारे खड़े थे, वहां आज स्वार्थ और लालच की दीवारें हर संबंध को अलग-अलग कर रही हैं। यह कोई अचानक आई आपदा नहीं है। यह धीरे-धीरे, लगभग अनदेखी तरीके से फैल रही एक महामारी है जिसका नाम है – लालच और स्वार्थ...
हम भौतिकवाद की चकाचौंध में इतने खो गए हैं कि भविष्य की पीढ़ी क्या विरासत पाएगी, इसकी चिंता हमें छू तक नहीं रही। हम अपने लालच में इतने अंधे हो चुके हैं कि परिवार टूट रहा है, दोस्ती बिक रही है, समाज का विश्वास डगमगा रहा है और देश की नैतिक नींव हिल रही है।
यह लेख इसी टूटते सामाजिक ढांचे की पड़ताल करता है, उसके कारण, उसके वर्तमान स्वरूप, उसके दूरगामी परिणाम और सबसे महत्वपूर्ण, हम क्या कर सकते हैं ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सिर्फ धन-दौलत नहीं, बल्कि ईमानदारी, मेहनत और सामूहिकता की मजबूत विरासत सौंप सकें।
लालच और स्वार्थ, मनुष्य का सबसे पुराना लेकिन सबसे खतरनाक शत्रु
लालच कोई नई बीमारी नहीं है। प्राचीन ग्रंथों में भी इसे ‘मोह’ और ‘लोभ’ के रूप में चित्रित किया गया है। लेकिन आधुनिक काल में यह रूप बदलकर इतना सूक्ष्म और आकर्षक हो गया है कि हम इसे पहचान ही नहीं पाते। आज का लालच सिर्फ धन का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, पद, पावर, लाइक्स, फॉलोअर्स, वायरल होने और ‘सक्सेस स्टोरी’ बनने का भी है।
लालच और स्वार्थ के मनोवैज्ञानिक कारण
अगर कारण देखा जाए तो, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से लालच और स्वार्थ, मुख्य रूप से तीन गहरी जड़ों से उपजते हैं।
सबसे पहला कारण, अभाव और असुरक्षा की भावना
बचपन में यदि व्यक्ति को पर्याप्त सुरक्षा, प्रेम या संसाधन न मिले हों, तो वह बड़े होने पर लगातार “काफी नहीं है” की भावना से ग्रस्त रहता है। यह डर उसे बार-बार और अधिक हासिल करने के लिए प्रेरित करता है, भले ही उसकी वर्तमान जरूरत पूरी हो चुकी हो।
दूसरा कारण सामाजिक तुलना (Social Comparison) है
मनोवैज्ञानिक लियोन फेस्टिंगर के अनुसार मनुष्य स्वभाव से दूसरों से खुद की तुलना करता है। आज सोशल मीडिया ने इस तुलना को 24×7 बना दिया है। हम लगातार दूसरों की चमकती जिंदगी देखते हैं और खुद को कमतर पाते हैं। इससे डोपामाइन का अस्थायी रस मिलता है जब हम कोई नया सामान खरीदते हैं, प्रमोशन पाते हैं या कोई लाइक मिलता है, लेकिन यह संतोष क्षणिक होता है। फिर नया लालच जन्म ले लेता है।
तीसरा महत्वपूर्ण कारण आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति है
विज्ञापन और पूंजीवाद हमें लगातार यह सिखाते हैं कि खुशी वस्तुओं में है, हैसियत ब्रांड में है और सफलता बैंक बैलेंस में है। इससे हमारे अंदर “चाहत की भूख” पैदा हो जाती है जो कभी शांत नहीं होती। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने स्वार्थ को इतना महत्वपूर्ण मान लेता है कि वह दूसरों के हित, रिश्ते और नैतिक मूल्यों को आसानी से नजरअंदाज कर देता है।
ये मनोवैज्ञानिक कारण लालच को केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक समस्या बना देते हैं।
लालच के विभिन्न रूप
लालच और स्वार्थ समाज में कई रूपों में आता है:
आर्थिक लालच: बैंक बैलेंस बढ़ाने की होड़ में लोग नैतिकता को ताक पर रख देते हैं। फर्जी बिल, टैक्स चोरी, घूसखोरी, शेयर मार्केट में अंदरूनी जानकारी का दुरुपयोग, ये सब रोजमर्रा की बातें बन चुकी हैं।
करियर का लालच: प्रमोशन के लिए साथी कर्मचारी को पीठ में छुरा घोंपना, बॉस की चापलूसी, क्रेडिट चोरी। युवा पीढ़ी को सिखाया जा रहा है कि “स्मार्ट वर्क” का मतलब मेहनत नहीं, बल्कि शॉर्टकट है।
राजनीतिक लालच: वोट बैंक के लिए धर्म, जाति और क्षेत्रवाद का इस्तेमाल। नेता जनता को लुभाने के लिए झूठे वादे करते हैं और सत्ता मिलते ही अपने स्वार्थ में डूब जाते हैं।
सामाजिक प्रतिष्ठा का लालच: सोशल मीडिया पर “परफेक्ट लाइफ” दिखाने की प्रतियोगिता। महंगे कपड़े, लग्जरी कार, विदेश यात्राएं, सब कुछ दिखावा बन गया है। असली खुशी खो गई है।
पारिवारिक लालच: संपत्ति के बंटवारे में भाई-बहन एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। बूढ़े माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजकर “स्वतंत्रता” का नाम दिया जाता है।
धार्मिक लालच: मंदिर-मस्जिद के नाम पर भीड़ जुटाकर वोट बटोरना या दान के नाम पर ठगी।
ये सभी रूप एक ही सिक्के के पहलू हैं, क्षणिक सुख के लिए दीर्घकालिक संबंधों को नष्ट करना।
सामाजिक ताना-बाना कैसे बिखर रहा है ?
पहले भारतीय समाज की मजबूती संयुक्त परिवार और सामुदायिक जीवन में थी। एक गांव का पूरा समाज एक परिवार की तरह था। किसी की बेटी की शादी हो तो पूरा मुहल्ला सहयोग करता था। किसी की फसल खराब हो तो सब मिलकर मदद करते थे। लेकिन आज ? हर घर एक किला बन गया है। दरवाजे बंद, दिल बंद, रिश्ते व्हाट्सएप पर सीमित।
आधुनिकता ने हमें सुविधा दी, लेकिन कीमत चुकाई हमने अपने सामाजिक बंधनों की। न्यूक्लियर परिवार बढ़े, तलाक के मामले बढ़े, बच्चों में अकेलापन बढ़ा, बुजुर्गों की उपेक्षा बढ़ी। अध्ययनों के अनुसार भारत में 60 वर्ष से ऊपर के 70% से अधिक बुजुर्ग अकेलेपन से जूझ रहे हैं। युवा पीढ़ी “मैं” और “मेरा” के चक्र में फंसकर “हम” को भूल गई है।
सोशल मीडिया ने इस विभाजन को और तेज कर दिया है। हम दूसरों की जिंदगी की चमक देखकर खुद को छोटा महसूस करते हैं। FOMO (Fear of Missing Out) ने हमें लालची और स्वार्थी बना दिया है। हर कोई जल्दी से जल्दी अमीर, मशहूर और “सक्सेसफुल” दिखना चाहता है। परिणाम ? बढ़ती अवसाद जैसी बीमारी, आत्महत्या की दर और मानसिक स्वास्थ्य की गिरावट।
आर्थिक असमानता भी लालच का ही परिणाम है। कुछ लोग अरबों कमाते जा रहे हैं जबकि करोड़ों भूखे सो रहे हैं। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में सबसे अमीर 1% आबादी के पास कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा है। यह असमानता नफरत पैदा करती है, सामाजिक तनाव बढ़ाती है और अंततः समाज को विभाजित करती है।
भविष्य की पीढ़ी को मिलने वाली विरासत
आज हम जो बीज बो रहे हैं, निश्चय ही कल उसी की फसल काटेगी हमारी संतान। अगर हम लालच और स्वार्थ को बढ़ावा देते रहे तो आने वाली पीढ़ी को क्या विरासत मिलेगी ?
- नैतिक पतन: मेहनत की जगह शॉर्टकट, ईमानदारी की जगह चालाकी को सम्मान मिलेगा।
- रिश्तों का सूखापन: परिवार सिर्फ जेनेटिक कनेक्शन रह जाएगा, भावनात्मक नहीं।
- पर्यावरणीय विनाश: लालच ने हमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करवा दिया। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वन कटाई – सब लालच का ही नतीजा है।
- सामाजिक अराजकता: बढ़ती अपराध दर, भ्रष्टाचार, जातिवाद और साम्प्रदायिकता।
- मानसिक स्वास्थ्य संकट: लगातार तुलना और असफलता का डर बच्चों को तोड़ देगा।
कल्पना कीजिए, 2050 की दुनिया। जहां हर बच्चा जन्म से ही “कॉम्पिटिशन” के माहौल में सांस ले रहा होगा। जहां स्कूल में पढ़ाई नहीं, बल्कि “पैकेज” की तैयारी हो रही होगी। जहां दोस्ती नहीं, बल्कि “नेटवर्किंग” होगा। जहां प्यार नहीं, बल्कि “ट्रांजेक्शन” होगा। क्या इस तरह का यह समाज टिक पाएगा ? क्या ऐसा समाज खुशहाल होगा ?
लालच के दुष्परिणाम: वास्तविक कहानियां
कुछ कहानियां हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
एक मध्यमवर्गीय परिवार का किस्सा। पिता ने सारी जिंदगी मेहनत की, बेटे को अच्छी शिक्षा दी। लेकिन बेटा जब नौकरी पर लगा, तो पहले ही महीने में बॉस को खुश करने के लिए गलत रिपोर्ट तैयार कर दी। पदोन्नति मिल गई, लेकिन पिता की सिखाई ईमानदारी चली गई। आज वह बेटा लाखों कमा रहा है लेकिन घर में शांति नहीं। रिश्ते टूट गए।
दूसरा उदाहरण, एक गांव का किसान। महाजन के लालच में फंसकर सूदखोरों के चंगुल में फंस गया। जमीन बिक गई, परिवार बिखर गया। यह कहानी लाखों किसानों की है, जो कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर लेते हैं।
शहरों में कॉर्पोरेट संस्कृति ने कर्मचारियों को मशीन बना दिया है। 18 घंटे काम, कोई छुट्टी नहीं, सिर्फ टारगेट। जब टारगेट पूरा नहीं होता तो “परफॉर्मेंस इम्प्रूवमेंट प्लान”। अंत में नौकरी चली जाती है। लालच ने हमें इंसान से “रिसोर्स” बना दिया है।
सुधार का रास्ता: व्यक्तिगत से सामूहिक तक
समस्या गंभीर है, लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं। बदलाव हमेशा व्यक्तिगत स्तर से शुरू होता है। संक्षेप में कुछ उपाय अपना कर निश्चित रूप से हम अपनी आगामी पीढ़ी को एक मजबूत आधार के साथ अपनी विरासत सौंप सकते हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर:
- रोज एक घंटा “डिटॉक्स”, मतलब सोशल मीडिया से दूर रहें और प्रकृति से जुड़ें।
- बच्चों को मेहनत का महत्व सिखाएं, न कि सिर्फ रिजल्ट के बारे बात करें।
- सभी में, “कम है तो भी काफी है” की भावना विकसित करें।
पारिवारिक स्तर पर:
- संयुक्त परिवार की परंपरा को फिर से जीवित करें।
- बुजुर्गों को सम्मान दें, उनकी कहानियां सुनें।
- बच्चों के साथ समय बिताएं, सिर्फ पैसे नहीं।
सामाजिक स्तर पर:
- स्कूलों में नैतिक शिक्षा अनिवार्य करें।
- गांव-गांव में “लालच मुक्त जीवन” अभियान चलाएं।
- मीडिया को जिम्मेदारी लेनी चाहिए, सकारात्मक कहानियां दिखाएं, न कि सिर्फ सनसनी फैलाएं।
राष्ट्रीय स्तर पर:
- भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करें।
- शिक्षा प्रणाली को रट्टा मारने से हटाकर मूल्यों पर आधारित बनाएं।
- गांधीजी के “अपरिग्रह” (non-possession) के सिद्धांत को अपनाएं।
समय अब भी हमारे हाथ में है
स्वार्थ और लालच ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह घेर लिया है। लेकिन यह घेरा अभी टूटा नहीं है। हम अभी भी सुधार कर सकते हैं। हमें बस इतना याद रखना है कि असली सफलता धन या पद में नहीं, बल्कि शांत मन, मजबूत रिश्तों और ईमानदार जीवन में है।
हमारी आने वाली पीढ़ी हमें सिर्फ इसीलिए याद रखेगी कि हमने उन्हें कितनी मजबूत नींव दी। अगर हम लालच की प्रवृत्ति पर लगाम लगाते हैं, मेहनत को सम्मान देते हैं, सहयोग की भावना जगाते हैं तो निश्चय ही हम उन्हें एक खुशहाल, शक्तिशाली और एकजुट समाज की विरासत सौंप सकेंगे...
लेखक का आह्वान:
"समय रहते जागें। क्योंकि कल बहुत देर हो जाएगी। आप भी अपने जीवन में एक छोटा-सा बदलाव लाएं। आज ही किसी रिश्ते को सुधारें, किसी गरीब की मदद करें, किसी को शॉर्टकट का रास्ता न दिखाएं। तब छोटे-छोटे कदम मिलकर ही सामाजिक ताना-बाना फिर से मजबूत होगा।"
लेखक -- मनोज भट्ट, कानपुर
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मनोज भट्ट कानपुर ...

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