एक उम्र, अनेक दिशाएँ : किशोरियों की पहचान, सपने और आत्मसम्मान One Age, Many Directions: Adolescent Girls, Identity, Dreams & Self-Worth
लड़कियों की किशोरावस्था, जीवन का वह दौर है जहाँ उम्र तो कुछ सालों में बदल जाती है, लेकिन भीतर चलने वाला परिवर्तन कई वर्षों तक असर छोड़ता है। यह वह समय है जब एक लड़की बचपन की सरलता से निकलकर धीरे-धीरे वयस्क दुनिया की जटिलताओं की ओर बढ़ती है। इस सफर में उसके साथ होते हैं, अनगिनत सवाल, अनकहे डर, छोटे-छोटे सपने और बड़ी-बड़ी उम्मीदें।
अक्सर समाज इस उम्र को “समस्या की उम्र” कहकर देखता है, जबकि सच यह है कि यह संभावनाओं की उम्र है। अगर इस समय सही समझ, सहारा और विश्वास मिले, तो यही किशोरियाँ कल एक संवेदनशील, आत्मनिर्भर और जागरूक समाज की नींव बनती हैं।
यह लेख उन सभी किशोरियों के लिए है जो कभी आईने में खुद से पूछती हैं..
- मैं कौन हूँ ?
- मेरी जगह कहाँ है ?
- क्या मैं जैसी हूँ, वैसी ठीक हूँ ?
और उन अभिभावकों व शिक्षकों के लिए भी, जो इन सवालों को समझना चाहते हैं।
1. किशोरावस्था क्या सच में कठिन होती है ?
किशोरावस्था को अक्सर विद्रोह, ज़िद और अस्थिरता से जोड़ दिया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह उम्र भीतर चल रहे तीव्र बदलावों की वजह से चुनौतीपूर्ण लगती है।
- शारीरिक परिवर्तन: शरीर तेज़ी से बदलता है। ऊँचाई बढ़ती है, चेहरे पर नयापन आता है, मासिक धर्म शुरू होता है। यह सब अचानक होता है और किशोरी को लगता है कि उसका शरीर अब उसका अपना नहीं रहा।
- भावनात्मक परिवर्तन: हार्मोन भावनाओं को प्रभावित करते हैं। कभी खुशी, कभी उदासी, कभी गुस्सा, सब कुछ बहुत जल्दी बदलता है।
- मानसिक परिवर्तन: सोच का दायरा अचानक बड़ा हो जाता है। दुनिया अब केवल घर और स्कूल तक सीमित नहीं रहती।
एक ओर बचपन की सुरक्षा छूटने लगती है, दूसरी ओर वयस्कता की ज़िम्मेदारियाँ डराने लगती हैं। यही बीच की स्थिति, न पूरी तरह बच्ची, न पूरी तरह बड़ी, अक्सर भ्रम पैदा करती है।
लड़कियों के लिए यह दौर और भी संवेदनशील होता है क्योंकि उनके शरीर से जुड़े बदलावों को समाज अक्सर संकोच और चुप्पी में ढक देता है। सवाल होते हैं, लेकिन जवाब नहीं मिलते। ऐसे में उलझन बढ़ना स्वाभाविक है।
2. सवाल पूछने की उम्र : ‘मैं कौन हूँ ?’
किशोरावस्था की सबसे बड़ी पहचान है, सवाल।
- मैं जैसी हूँ, क्या वैसी ठीक हूँ ?
- क्या मुझे सबसे अलग दिखना चाहिए ?
- लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं ?
- मेरा भविष्य कैसा होगा ?
बच्चियों के ये सवाल कमजोरी नहीं, बल्कि सोच के विकसित होने का संकेत हैं। इस उम्र में मस्तिष्क यह समझने लगता है कि दुनिया केवल परिवार तक सीमित नहीं है। उनके अंदर अपनी एक अलग पहचान बनाने की इच्छा जन्म लेने लगती है।
समस्या तब होती है जब इन सवालों को “बचपना” या “ज़्यादा सोच” कहकर दबा दिया जाता है। सवाल दबते हैं, लेकिन खत्म नहीं होते। और इस तरह का द्वंद्व, भीतर ही भीतर उनके आत्मविश्वास को खोखला कर देता है।
किशोरियों को यह समझना ज़रूरी है कि सवाल पूछना उनका अधिकार है। सही सवाल ही सही दिशा देते हैं।
3. सपनों की पहली दस्तक
यही वह उम्र है जब सपने आकार लेने लगते हैं। कोई डॉक्टर बनना चाहती है, कोई कलाकार, कोई लेखिका, कोई खिलाड़ी। सपने कभी बहुत स्पष्ट होते हैं, तो कभी धुंधले।
लेकिन इसी उम्र में हमारे सामाजिक ताना-बाना की रूढ़िवादी आवाज़ भी तेज़ हो जाती है...
- “लड़कियों के लिए यह ठीक नहीं।”
- “यह तो लड़कों का क्षेत्र है।”
- “इतना सोचने की ज़रूरत नहीं।”
धीरे-धीरे कई किशोरियाँ अपने सपनों को ‘व्यवहारिक’ और ‘अव्यवहारिक’ की सूची में बाँटने लगती हैं। कई अपने सपने बिना कोशिश के ही छोड़ देती हैं।
समाज को यह समझना ज़रूरी है कि सपने देखना कोई अपराध नहीं है। सपने उम्र नहीं देखते। सपने वही बीज हैं, जिनसे भविष्य के पेड़ उगते हैं।
4. तुलना का दबाव : सोशल मीडिया और समाज
तेजी से बदलती हुई इस दुनिया में आज की किशोरियाँ केवल अपने आस-पास के लोगों से नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से खुद की तुलना कर रही हैं। सोशल मीडिया पर परफेक्ट चेहरे, परफेक्ट शरीर और परफेक्ट ज़िंदगी दिखाई जाती है।
इसीलिए उनके अंदर इससे यह भ्रम पैदा होता है कि, “सबकी ज़िंदगी मुझसे बेहतर है।”
जबकि हकीकत यह है कि सोशल मीडिया, केवल ज़िंदगी का चुना हुआ हिस्सा दिखाता है। वहाँ संघर्ष, डर और असफलताएँ अक्सर छुपी रहती। हैं।
इस तरह की लगातार तुलना किशोरियों के आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाती है। इसलिए उन्हें यह समझना बेहद ज़रूरी है कि हर लड़की की यात्रा अलग है। किसी और की टाइमलाइन तुम्हारी घड़ी नहीं है।
5. भावनात्मक उतार-चढ़ाव : क्यों लगता है सब कुछ ज़्यादा ?
यह बिंदु इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब कोई भी बच्ची, बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश करती हैं तब उनके तन और मन में प्राकृतिक रूप से तेजी से तमाम तरह के परिवर्तन होते हैं, जिन्हें वह खुद के साथ दूसरों को भी स्पष्ट नहीं कर पाती।
जैसे बिना कारण रोना, कभी छोटी बात पर गुस्सा, कभी बेहद खुश और कभी बेहद उदास, ये सब किशोरावस्था के सामान्य अनुभव हैं। इस तरह के मानसिक लक्षण के साथ साथ शारीरिक बदलाव की सरल जानकारी, उन्हें अपनो से अवश्य मिलनी चाहिए।
लेकिन लड़कियों को अक्सर कहा जाता है, “ज़्यादा भावुक मत बनो।” जबकि भावनाएँ दुश्मन नहीं हैं। वे संकेत हैं कि भीतर कुछ चल रहा है। ज़रूरत है उन्हें समझने और सही तरीके से व्यक्त करने की।
अगर भावनाओं को दबाया जाएगा, तो वे बाद में और भारी रूप में सामने आएंगी। बात करना, लिखना, भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करना, ये सब भावनात्मक स्वास्थ्य के तरीके हैं।
6. परिवार और किशोरी : दूरी या सेतु ?
ये विडम्बना है कि इस उम्र में लड़कियों को अक्सर ऐसा लगता है कि माता-पिता “समझते नहीं हैं।” और वहीं माता-पिता को लगता है कि बच्ची “बदल गई है।”
यह दूरी असल में संवाद की कमी से पैदा होती है। माता-पिता का स्वाभाविक डर अनुभव से आता है, और किशोरी की बेचैनी अनजान बदलाव से।
अगर दोनों पक्ष सुनने की कोशिश करें, तो यही दूरी एक सेतु बन सकती है। परिवार वह जगह होनी चाहिए जहाँ किशोरी बिना डर के अपने सवाल रख सके।
7. असुरक्षा और आत्मसम्मान
शरीर, रंग, आवाज़, चाल, इस उम्र में हर चीज़ को लेकर किसी को भी असुरक्षा महसूस हो सकती है। क्योंकि समाज सुंदरता के सीमित पैमाने तय करता है, और किशोरियाँ खुद को उन्हीं तराजुओं पर तौलने पर मजबूर सी लगती हैं।
लेकिन एक लड़की को जब इस बात का एहसास होता है कि आत्मसम्मान बाहर से नहीं, भीतर से बनता है। तब वह मजबूती की तरफ कदम बढ़ाती है। साथ ही यह तब और भी मजबूत होता है जब उसको यह एहसास होता है कि उसकी कीमत उसके रूप से नहीं, उसके अस्तित्व से है।
8. गलतियाँ भी सीख हैं
किशोरावस्था में गलतियाँ होना सभी के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, गलत फैसले, गलत दोस्त, गलत उम्मीदें। लेकिन गलती को जीवन की आख़िरी सच्चाई मान लेना सबसे बड़ी भूल है।
अगर उससे सीखा जाए तो हर गलती हमेशा के लिए अनुभव बन सकती है। साथ ही यह चुनौती भी है कि इस उम्र में गलती को अपराध न बनाया जाए, बल्कि सीख का अवसर समझा जाए।
9. यह उम्र क्यों सबसे महत्वपूर्ण है ?
क्योंकि यहीं से आत्मविश्वास या आत्म-संदेह की नींव पड़ती है। क्योंकि यहीं से सपनों को दिशा मिलती है या वे दब जाते हैं। क्योंकि यहीं से एक लड़की खुद को देखना सीखती है।
अगर इस उम्र में उसे भरोसा, समझ और सम्मान मिले, तो वह जीवन भर खुद पर विश्वास रखती है।
अंत में निष्कर्ष यह निकलता है कि यह सिर्फ शुरुआत है...किशोरावस्था कोई समस्या नहीं, एक संभावना है। यह वह मिट्टी है जिसमें भविष्य के बीज बोए जाते हैं। हर किशोरी अपने भीतर एक कहानी लिए चलती है, संघर्षों की, सपनों की और उम्मीदों की।
सामाजिक ताना-बाना यह विश्वास दिलाता है कि किशोरावस्था की लड़कियों के लिए यह यात्रा अकेली नहीं है। यह श्रृंखला उसी विश्वास की अगली कड़ी है।
अगले भाग में हम बात करेंगे,“मैं सिर्फ किसी की बेटी नहीं हूँ : अपनी पहचान की खोज”,जहाँ आत्मसम्मान और पहचान के सवालों को और गहराई से समझेंगे।
लेखक - मनोज भट्ट, कानपुर 06 फरवरी 2026
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मनोज भट्ट कानपुर ...
