समाज की निगाहें और मेरी राह – लड़कियों की किशोरावस्था (भाग 4) Society’s Expectations and My Path – Understanding Girls’ Adolescence (Part 4)
समाज की निगाहें और मेरी राह
(लड़कियों की किशोरावस्था-भाग 4)
“समाज से जुड़ो, लेकिन उसमें खो मत जाओ।”
किशोरावस्था वह उम्र है जब सपने पंख फैलाने लगते हैं, लेकिन समाज की निगाहें अक्सर उन पंखों को काटने की कोशिश करती हैं। हर कदम पर एक अदृश्य नजर महसूस होती है, पड़ोस की, रिश्तेदारों की, स्कूल की, सोशल मीडिया की।
यह लेख श्रृंखला का चौथा भाग है, जहाँ हम समाज की अपेक्षाओं, परंपराओं और निगाहों की चर्चा करेंगे, और देखेंगे कि एक किशोरी कैसे अपनी राह चुन सकती है।
पिछले भागों में हमने किशोरावस्था के सवालों (भाग 1), पहचान की खोज (भाग 2), और घर में संवाद की हिम्मत (भाग 3) पर बात की।
अब किशोरियों बाहर की दुनिया में कदम रखते हैं, वहां परंपरा बाँधती है और अपेक्षाएँ दबाती हैं, लेकिन इन सबसे मुक्ति देता है, उनका "सवाल पूछने का अधिकार"।
1. समाज की अपेक्षाएँ:-- अदृश्य जंजीरें
बेटियों के लिए समाज की अपेक्षाएँ बचपन से ही बुनी जाती हैं, “लड़की हो तो शांत रहो”, “घर का काम सीखो”, “सपने देखो लेकिन सीमा में”। किशोरावस्था में ये अपेक्षाएँ गहरी हो जाती हैं।
स्कूल मे अपेक्षाएं, “लड़कियाँ साफ-सुथरी रहती हैं”, आस पड़ोस की अपेक्षाएं, “बड़ी हो रही हो, संभलकर चलो”, सोशल मीडिया पर कुछ ज्यादा ही, “परफेक्ट दिखो, लेकिन बहुत स्मार्ट मत बनो”।
एनसीईआरटी जैसी रिपोर्ट्स बताती हैं कि 70% से अधिक किशोरियाँ, समाज के 'सुरक्षित रहने' के नाम पर एक सामान्य साधारण दिनों में भी अपने आप को सीमित महसूस करती हैं।
किशोरियों के पार्क में खेलने जाने से पहले "अच्छे कपड़े पहनने की अपेक्षा तो की ही जाती है, साथ ही “लोग क्या कहेंगे ?” जैसे चुभने वाले शब्द बाण भी सुनने को मिलते हैं।
इस तरह की छोटी छोटी बातें इकट्ठा होकर उनकी राह को संकुचित कर देती हैं। किशोरियों से एकतरफा अपेक्षाएँ ही समस्या की जड़ हैं। लड़कियों से, समझदारी और लड़कों से साहस की अपेक्षा।
लेकिन पहचान बनने और बनाने के इस दौर में, इस तरह की अपेक्षाओं को चुनौती देना जरूरी है। इसलिए किशोरियों का पहला कदम ये होना चाहिए कि अपेक्षा को पहचानो और समझो कि यह तुम्हारी नहीं, समाज की है।
2. परंपरा बनाम स्वतंत्र सोच:-- संतुलन की खोज
हमारी चिर कालीन, मान्य परंपराएं समाज को जोड़ती है, लेकिन यही मान्यताएं किशोरावस्था में कभी-कभी गाँठ बन जाती है। एक तरफ “विवाह के बाद घर संभालो”, दूसरी तरफ “मैं डॉक्टर/उद्यमी बनूँगी”के बीच का द्वंद्व।
हमारी परंपराएँ अच्छी हैं, सुंदर हैं जैसे हमारे त्योहार, रिश्ते और मूल्य, लेकिन जब वे किसी को सीमित करने लगें, या बांधने वाले हों तो यही मान्यताएं बोझ बन जाती हैं। उदाहरण: दीपावली पर लड़कियाँ मिठाई बनाती हैं, लड़के पटाखे फोड़ते हैं।
किसी की स्वतंत्र सोच कोई विद्रोह नहीं, बल्कि संतुलन है। परंपरा को सम्मान दो, लेकिन अपनी शर्तों पर। प्रिया जो अभी 16 वर्ष की है लेकिन उसका परिवार “18 में शादी की बातें” करने लगता है, जबकि उसका सपना आईएएस बनना है।
वह सोचती है और स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए, डायरी में लिखो “यह परंपरा क्यों ?”“परंपरा बदलती भी है।” , दोस्तों से चर्चा करो, इतिहास से प्रेरणा लो (रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले)।
यूएन वुमन जैसी रिपोर्ट्स कहती हैं कि स्वतंत्र सोच अपनाने वाली किशोरियाँ 40% अधिक आत्मविश्वासी होती हैं। निःसंदेह परंपराएं जड़ें देती है, जबकि स्वतंत्र सोच पंख, इसलिए दोनों जरूरी हैं।
3. सवाल पूछने का अधिकार:-- चुप्पी तोड़ो
किशोरावस्था सवालों की उम्र है, लेकिन समाज उन्हें चुप्पी सिखाता है। “ऐसा क्यों ?” पूछना गलत लगता है। लेकिन सवाल पूछना ताकत है, यह परंपराओं को चुनौती देता है, अपेक्षाओं को उजागर करता है।
व्यावहारिक उदाहरण, अगर शिक्षक कहें “लड़कियाँ विज्ञान में कमजोर होती हैं”, तो पूछो “क्यों ? प्रमाण क्या है ?”। अगर रिश्तेदार कहें “शादी के बाद नौकरी छोड़ दो”, तो पूछो “क्यों ? मेरी खुशी के लिए क्या ?”
हर प्रश्न सम्मानजनक तरीके से पूछो। 17 वर्ष की मीरा के गाँव में साइकिल चलाने पर ऐतराज किया गया पर उसने सवाल किया, “मैं समझना चाहती हूँ कि क्या गलत है…?” आज कई लड़कियाँ साइकिल चलाती हैं।
यह पहचान बनाम भूमिका के बीच भ्रम का दौर है। सवाल, पहचान चुनने में मदद करते हैं। डर है “लोग क्या कहेंगे ?”, लेकिन चुप्पी डर बढ़ाती है, सवाल कम करती है। जबकि सवाल पूछने से आत्मविश्वास बढ़ता है।
4. समाज की निगाहें:-- तुलना और आत्म-संदेह
समाज की निगाहें केवल देखती नहीं, आंकती भी हैं। किशोरावस्था में यह आंकना तुलना बन जाता है। “देखो, वह लड़की कितनी सुंदर है।” “उसकी बेटी तो डॉक्टर बनेगी।” ये तुलनाएँ आत्म-संदेह पैदा करती हैं। “क्या मैं पर्याप्त हूँ ?” यह सवाल किशोरी को अंदर से खोखला कर देता है।
सोशल मीडिया ने इसे और बढ़ा दिया। इन पर सामने से हर लड़की परफेक्ट लगती है, यात्राएँ, कपड़े और दोस्त आदि। लेकिन इसके पीछे की सच्चाई जानकर अक्सर निराशा उत्पन्न कर जाती है। क्योंकि उस परफेक्शन के पीछे संपादन, फिल्टर, दिखावा ही होता है।
एक रिपोर्ट कहती है कि 60% किशोरियाँ सोशल मीडिया से बॉडी इमेज इश्यूज का शिकार हो जाती हैं। आजकल समाज की निगाहें डिजिटल हो गई हैं, जो लाइक्स, कमेंट्स, फॉलोअर्स के हिसाब से अपनी अवधारणा गढ़ती हैं।
इस दबाव से निपटने के लिए, अपनी निगाहें समाज पर डालो। पूछो,“यह तुलना सच्ची है ?”दोस्तों से बात करो और पूछो,“क्या तुम्हें भी ऐसा लगता है ?”और याद रखो, समाज की निगाहें परफेक्शन नहीं, परिणाम चाहतीं है। एक किशोरी जब अपनी मंजिल पर सफलतापूर्वक पहुंचती है, तो सबकी निगाहें प्रशंसा में बदल जाती हैं।
5. स्वतंत्र राह चुनने के व्यावहारिक सुझाव
अब प्रश्न आता है कि कैसे चुनें अपनी राह ? यहां लेखक द्वारा किशोरियों के लिए कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए जा रहे हैं।
- रोज़ाना जर्नलिंग:-- लिखो, “आज समाज ने क्या कहा ? मैं क्या महसूस करती हूँ ?”
- मेंटॉरशिप:-- एक शिक्षिका या रोल मॉडल से जुड़ो, जो सवालों को प्रोत्साहित करे।
- समुदाय बनाओ:-- दोस्तों का ग्रुप, जहाँ सवाल साझा हों।
- परंपरा को रीइन्वेंट करो:-- दीवाली पर मिठाई बनाओ, लेकिन साथ में ब्लॉग लिखो अपनी रेसिपी पर।
- स्वास्थ्य का ध्यान:-- योग, ध्यान से मानसिक ताकत बढ़ाओ।
ये सुझाव छोटे लेकिन महत्वपूर्ण हैं और प्रभावी भी। एक किशोरी जब इन्हें अपना सिद्धांत बनाएगी तो निश्चय ही, समाज की निगाहें भी उसकी सहयोगी बन जाएंगी।
6. प्रेरक कहानी:-- सारा की राह
सारा, कानपुर की 14 साल की लड़की। समाज कहता था, “लड़की हो, तो कढ़ाई सीखो।” लेकिन सारा को क्रिकेट पसंद था। परिवार ने मना किया, “लड़कियाँ क्या मैदान में?” सारा ने सवाल पूछा: “क्यों नहीं? मिताली राज ने तो खेला।” धीरे-धीरे परिवार सहमत हुआ। आज सारा लोकल टीम में खेलती है। उसकी कहानी बताती है कि सवाल राह बनाते हैं।
7. परिवार और समाज की भूमिका:-- सहायक या बाधक
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि परिवार ही पहला समाज है। यदि परिवार से अपेक्षाएँ थोपी जाती हैं “लड़की हो तो बाहर मत घूमो”, तो यह बाधक बनता है और इससे कई किशोरियाँ अक्सर अपना शौक दबा देती हैं।
लेकिन सहायक परिवार होता है तो वह किशोरियों के सवाल सुनता है, उनके सपनों को प्रोत्साहित करता है। नेहा की कहानी भी कुछ इसी तरह की थी, परिवार ने उसके लिए समाज को चुनौती दी, आज वह आईआईटी में है।
कोई भी समाज एक बड़ा परिवार होता है। इसी में बाधक समाज, रूढ़ियाँ मजबूत करता है, जबकि सहायक समाज, रोल मॉडल्स आगे लाता है। केरल के कुछ गाँवों में लड़कियाँ लीडरशिप का रोल निभाती हैं।
इसीलिए किशोरियों के लिए, परिवार और समाज जब सहायक की भूमिका निभाते हैं तब, सभी लोगों की निगाहें जंजीरें नहीं, पथप्रदर्शक बन जाती हैं।
8. चुनौतियाँ और समाधान:-- वास्तविकता का सामना
आज के दौर में किशोरियों के सामने विभिन्न प्रकार की चुनौतियां आती है, जिसका उन्हें हर हाल में बहादुरी और बुद्धिमत्ता के साथ सामना करना चाहिए। निम्न सलाह पर अमल करके आगे बढ़ना आसान हो जाएगा।
ट्रोलिंग/आलोचना:-- डिजिटल युग में राय देने पर ट्रोल्स होने पर अपनी प्रोफाइल प्राइवेट रखो, ट्रोल्स इग्नोर करो, पॉजिटिव कम्युनिटी जॉइन करो, अफर्मेशन दोहराओ।
अलगाव:-- यदि परिवार/दोस्त दूरी बना लें तो उनसे संवाद बढ़ाओ, काउंसलर/मेंटर से जुड़ो, फैमिली मीटिंग रखो, नया ग्रुप बनाओ।
संसाधन की कमी:-- आर्थिक बाधाएँ अगर आती हैं तो सरकारी योजनाएँ (बेटी बचाओ), फ्री ऑनलाइन कोर्स, लोकल लाइब्रेरी, छोटे प्रोजेक्ट शुरू करो।
हमेशा ध्यान रखो कि चुनौतियाँ, जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक परीक्षा हैं। ट्रोलिंग से लचीलापन, अलगाव से स्वावलंबन और कमी से रचनात्मकता आती है।
9. भविष्य की दिशा:-- सशक्त समाज की कल्पना
2030 के भारत की कल्पना करो, स्कूल में जेंडर सेंसिटिविटी विषय, परिवार में सपनों की शेयरिंग, पंचायतों में गर्ल्स फोरम, #MyPathMyPride ट्रेंड।अर्थव्यवस्था मजबूत, संस्कृति समृद्ध और इन सबके पीछे लड़कियाँ केंद्र में होंगी
इन सबके लिए किशोरियों को चतुर्दिक दिशा में कदम बढ़ाने होंगे जैसे शिक्षा सुधार, पैरेंट वर्कशॉप, “राह चुनो” कैंपेन, डिजिटल ऐप्स आदि और इसके लिए छोटे छोटे ग्रुप बना कर इन क्षेत्रों में किशोरी अपना योगदान दे तो निश्चय ही हर एक सशक्त लड़की, सशक्त समाज की नींव बनेगी।
अंत में निष्कर्ष...अपनी राह पर चलो
समाज की निगाहें हैं, लेकिन राह तुम्हारी है। परंपरा अपनाओ, स्वतंत्र सोच से। सवाल पूछो। परिवार-सहयोगी बनें, चुनौतियाँ जीतो, भविष्य सशक्त बनाओ। “समाज से जुड़ो, लेकिन उसमें खो मत जाओ।”
लेखक: मनोज भट्ट, कानपुर 15 मार्च 2026
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