अपनी पहचान की खोज (लड़कियों की किशोरावस्था भाग 2): Discovering My Own Identity (Adolescence of Girls Part 2)
अपनी पहचान की खोज ...
(लड़कियों की किशोरावस्था..भाग 2)
मैं सिर्फ किसी की बेटी नहीं हूँ ...
जब सवाल बाहर नहीं, भीतर से उठते हैं, तब किशोरावस्था का सबसे गहरा और सबसे मौन प्रश्न होता है, “मैं कौन हूँ ?” यह सवाल अक्सर ज़ोर से नहीं पूछा जाता, लेकिन भीतर लगातार गूंजता रहता है।
एक किशोरी अपने चारों ओर कई पहचान ओढ़े रहती है, वह किसी की बेटी, किसी की बहन, किसी की छात्रा, किसी की सहेली। ये सभी पहचानें महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन इनमें से कोई भी उसकी पूरी पहचान नहीं होती।
समस्या तब शुरू होती है जब समाज और परिवार इन्हीं भूमिकाओं को उसकी अंतिम पहचान मान लेते हैं। तब एक लड़की धीरे-धीरे खुद को उन्हीं सीमाओं में देखना सीख लेती है।
यह लेख श्रृंखला, "लड़कियों की किशोरावस्था" का दूसरा भाग है जो उसी घेरे को पहचानने और उससे बाहर निकलने की प्रक्रिया पर केंद्रित है।
“सामाजिक ताना-बाना” मानता है कि जब तक एक किशोरी अपनी पहचान नहीं समझेगी, तब तक वह न तो पूरी तरह स्वतंत्र हो पाएगी और न ही आत्मविश्वासी।
1. पहचान क्या होती है ?
पहचान केवल नाम, उम्र या रिश्तों के नाम से ही नहीं है। बल्कि पहचान वह एहसास है जो हमें यह बताता है कि मुझे क्या पसंद है, मुझे क्या स्वीकार नहीं, मेरी सीमाएँ क्या हैं, मेरी आकांक्षाएँ क्या हैं और मैं किन मूल्यों के साथ खड़ी हूँ
यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो किशोरावस्था, पहचान निर्माण का महत्वपूर्ण चरण है। यही समय होता है जब वह अपने बचपने से, दूसरों की निर्भरता से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र सोच गढ़ता है।
किशोरावस्था में भ्रम होना असफलता नहीं, बल्कि प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन समस्या तब होती है जब किसी लड़की को यह अवसर ही नहीं मिलता कि वह स्वयं को खोज सके।
2. रिश्तों के दायरे में क़ैद पहचान
अक्सर एक लड़की से कहा जाता है, “तुम घर की इज़्ज़त हो”, “तुम्हें सबका ध्यान रखना चाहिए” और “लड़कियाँ ऐसा नहीं करतीं”.. आदि - आदि। इन वाक्यों में छिपा संदेश साफ़ होता है, तुम्हारी प्राथमिक पहचान दूसरों की अपेक्षाओं से तय होगी।
धीरे-धीरे लड़की यह मानने लगती है कि यदि उसने अपनी पसंद ज़ाहिर की तो वह स्वार्थी कहलाएगी। यदि उसने असहमति जताई तो वह बदतमीज़ कही जाएगी। यहीं से आत्म-दमन शुरू होता है। वह बोलने से पहले सोचती है, “लोग क्या कहेंगे ?”
और यही डर उसकी पहचान को सीमित करने लगता है।
3. "अच्छी लड़की" का अदृश्य बोझ
समाज में "अच्छी लड़की" की एक तय छवि होती है, जो ज़्यादा सवाल न करे, जो सबकी बात मान ले, जो खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचे और जो त्याग को अपनी पहचान बना ले...यह छवि बाहर से आदर्श तो लग सकती है, लेकिन भीतर से यह एक भारी बोझ है।
जब एक किशोरी हर समय "अच्छी" बने रहने की कोशिश करती है, तो वह धीरे-धीरे अपनी सच्ची भावनाओं से दूर हो जाती है। वह अपनी नाराज़गी दबाती है, अपनी इच्छाएँ टालती है, और अंततः खुद को खोने लगती है।
4. तुलना का जाल और आत्म-संदेह
आज की किशोरियाँ तुलना के ऐसे दौर में जी रही हैं जहाँ तुलना केवल पड़ोस या स्कूल तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया ने तुलना को वैश्विक बना दिया है। कोई ज़्यादा सुंदर दिखता है, कोई ज़्यादा लोकप्रिय है, कोई ज़्यादा प्रतिभाशाली लगता है।
हर तस्वीर में आत्मविश्वास झलकता है, हर प्रोफ़ाइल में सफलता चमकती है। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे की असलियत अक्सर दिखाई नहीं देती। फिर यही तुलना उसके अंदर धीरे-धीरे आत्म-संदेह को जन्म देती है
उसके अंतर्मन में प्रश्न उठने लगते हैं कि“क्या मैं पर्याप्त हूँ ?” या “क्या मुझमें कुछ कमी है ?” यह आत्म-संदेह पहचान की खोज में सबसे बड़ी बाधा है। क्योंकि जब हम खुद को कमतर मान लेते हैं, तब हम खुद को जानने की कोशिश ही छोड़ देते हैं।
5. अपनी आवाज़ पहचानना
पहचान की खोज का पहला कदम है, अपनी आवाज़ को पहचानना।बअपनी आवाज़ का अर्थ केवल बोलना नहीं, बल्कि यह समझना है कि मैं किस बात पर सहज हूँ, किस बात पर असहज हूँ, मैं कहाँ ‘हाँ’ कहना चाहती हूँ और कहाँ ‘ना’...
कई किशोरियाँ ‘ना’ कहना असभ्यता समझती हैं। लेकिन सच यह है कि ‘ना’ कहना आत्मसम्मान की पहली सीढ़ी है। जब एक लड़की पहली बार आत्मविश्वास से ‘ना’ कहती है, तो वह केवल एक निर्णय नहीं लेती, वह अपनी पहचान की रक्षा करती है।
6. रुचियाँ : पहचान के छोटे-छोटे सुराग
हर लड़की के भीतर कुछ ऐसा होता है जो उसे खुशी देता है, कभी किताबें, कभी संगीत, कभी खेल, कभी चित्रकारी, कभी लेखन। ये रुचियाँ केवल शौक नहीं होतीं, ये पहचान बनाने के रास्ते होते हैं। जब किसी किशोरी को उसकी रुचियों के लिए जगह नहीं मिलती, तो उसकी पहचान अधूरी रह जाती है।
रुचियाँ दबाने से आत्मविश्वास कमजोर होता है और आत्म-अभिव्यक्ति रुक जाती है। परिवार और विद्यालय यदि इन रुचियों को पोषण दें, तो यही रुचियाँ भविष्य की दिशा बन सकती हैं।
7. गलतियाँ और प्रयोग : खुद को जानने का रास्ता
पहचान प्रयोग से बनती है। हर अनुभव, हर गलती, हर बदलाव हमें खुद के बारे में कुछ सिखाता है। लेकिन लड़कियों की गलतियों को समाज अक्सर अधिक कठोरता से देखता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे ‘सही’ निर्णय लें, ‘सुरक्षित’ रहें और ‘मर्यादा’ में रहें।
इस दबाव में वे जोखिम लेने से डरने लगती हैं। यह समझना ज़रूरी है कि बिना प्रयोग के पहचान स्थिर हो जाती है, और बिना गलती के सीख अधूरी रहती है।गलतियाँ असफलता नहीं, बल्कि आत्म-खोज का हिस्सा हैं।
8. परिवार की भूमिका : समर्थन या सीमा ?
परिवार, किशोर लड़कियों की पहचान की खोज में या तो सहायक बन सकता है, या बाधा। जब परिवार सुनता है तो प्रश्नों को स्वीकार करता है, संवाद को महत्व देता है, निर्णय थोपने की बजाय समझाता है और तब किशोरी खुद को सुरक्षित महसूस करती है।
लेकिन जब तुलना, ताने और नियंत्रण ज़्यादा होते हैं, तब उसकी पहचान डर में सिमटने लगती है। परिवार को यह समझना होगा कि पहचान देना संभव नहीं, पहचान खोजने में साथ देना ही सबसे बड़ा समर्थन है।
9. शिक्षकों और समाज की भूमिका
विद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का स्थान भी है। यदि शिक्षक, प्रश्न पूछने को प्रोत्साहित करें, असहमति को सम्मान दें और तुलना की बजाय प्रगति पर ध्यान दें, तो किशोरियाँ अपनी सोच विकसित कर पाती हैं।
समाज को भी ‘आदर्श लड़की’ की कठोर परिभाषा से बाहर आना होगा। हर लड़की एक अलग व्यक्तित्व है, और उसे एक ही साँचे में ढालने की कोशिश उसकी पहचान को सीमित करती है।
10. आत्मसम्मान : पहचान की जड़
किशोरियों को यह समझना होगा कि आत्मसम्मान का अर्थ खुद को सर्वश्रेष्ठ मानना नहीं, बल्कि खुद को स्वीकार करना है। अपनी कमज़ोरियों, गलतियों और सीमाओं के साथ खुद को अपनाना ही आत्मसम्मान है।
जब आत्मसम्मान मजबूत होता है तब बाहरी आलोचना कम चोट पहुँचाती है, तुलना कम असर करती है और निर्णय लेने का साहस बढ़ता है इसलिए पहचान की जड़ आत्मसम्मान में ही होती है।
11. पहचान और स्वतंत्रता
स्वतंत्रता केवल बाहर जाने या निर्णय लेने की आज़ादी नहीं है। असली स्वतंत्रता है, अपने बारे में सोचने की आज़ादी। स्वतंत्रता का अर्थ विद्रोह नहीं, बल्कि सजग चयन है।
एक किशोरी जब यह समझ लेती है कि वह दूसरों की अपेक्षाओं से अलग भी सोच सकती है, तभी उसकी पहचान स्पष्ट होने लगती है।
12. एक छोटी सी कहानी
रीमा (काल्पनिक नाम) हमेशा ‘अच्छी बेटी’ रही। उसने कभी अपने फैसले खुद नहीं लिए। कॉलेज में उसे साहित्य पढ़ना था, लेकिन परिवार ने उसे विज्ञान चुनने को कहा। वह चुप रही।
कुछ वर्षों बाद उसने महसूस किया कि वह सफल तो है, पर संतुष्ट नहीं। उसने धीरे-धीरे लेखन शुरू किया। शुरुआत में उसे विरोध मिला, लेकिन उसने अपनी रुचि नहीं छोड़ी। आज वह कहती है,
“मैं अपने परिवार से अलग नहीं, लेकिन मैं सिर्फ उनकी अपेक्षाओं का विस्तार भी नहीं हूँ।” यह वाक्य उसकी पहचान की घोषणा था। पहचान एक यात्रा है, परिणाम नहीं...
पहचान कोई तैयार चीज़ नहीं होती जो एक दिन अचानक मिल जाए। यह एक यात्रा है, धीमी, उलझी हुई, लेकिन बेहद ज़रूरी। हर किशोरी को यह अधिकार है कि वह खुद को तलाशे, बदले, सीखे और फिर बदले।
उसे यह कहने का साहस होना चाहिए, “मैं सिर्फ किसी की बेटी नहीं हूँ। मैं एक सोच हूँ। मैं एक संभावना हूँ।और अपनी पहचान खुद गढ़ने का अधिकार रखती हूँ।”
“सामाजिक ताना-बाना” का विश्वास है, जब एक लड़की अपनी पहचान, पहचान लेती है, तो वह केवल खुद को नहीं बदलती, वह आने वाली पीढ़ियों की दिशा भी बदल देती है...
लेखक, मनोज भट्ट, कानपुर। 26 फरवरी 2026 --------------------------------------------------- पारिवारिक एवं सामाजिक सरोकार के अन्य विषय एवं उपरोक्त विचारों से संबंधित अन्य लेख पढ़ने हेतु कृपया नीचे शीर्षक पर क्लिक करें 👇
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मनोज भट्ट कानपुर ...

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