असफलता का डर और फिर से उठने की कला
असफलता का डर और फिर से उठने की कला
(“लड़कियों की किशोरावस्था”: श्रृंखला भाग 10:)
किशोरियों की समझ, साहस और सपनों की यात्रा
पहली सुबह, पहला सबक
सुबह जब सूरज निकलता है तो वह रात के अँधेरे का हिसाब नहीं माँगता। वह बस रोशनी बिखेर देता है। किशोरावस्था भी ऐसी ही है। यहाँ रातें लंबी लगती हैं, आँसू भारी लगते हैं, और गिरना बहुत आसान लगता है।
पर हर सुबह एक नई संभावना लेकर आती है। यह भाग उसी संभावना का है। यह भाग असफलता का है, पर मातम का नहीं। यह डर का है, पर घुटने टेकने का नहीं। यह गिरने का है, पर पड़े रहने का नहीं।
हम सब गिरते हैं। कोई परीक्षा में, कोई दोस्ती में, कोई प्रेम में, कोई सपने में। और दुनिया का हर समाज, हर देश, हर गली-नुक्कड़ लड़कियों के गिरने को कुछ ज़्यादा ही शोर से देखता है। इसलिए आज की बात सिर्फ तुम्हारी नहीं है।
यह बात है काबुल की उस लड़की की जिसे स्कूल जाने से रोका गया। यह बात है सूडान की उस लड़की की जिसे कम उम्र में ब्याह के लिए कहा गया। यह बात है कोलंबिया की उस लड़की की जिसे फुटबॉल खेलने पर ‘लड़कों जैसी’ कहा गया।
यह बात है टोक्यो की उस लड़की की जिसे हर समय ‘पूर्ण’ दिखने का दबाव तोड़ देता है। और यह बात है तुम्हारी, जो भारत के किसी भी कोने में बैठकर सोचती है कि “क्या मैं वाकई काफी हूँ?”
असफलता क्या है : एक नाम, कई चेहरे
असफलता को हम अक्सर एक नतीजा समझते हैं। अंक कम आए, रिश्ता टूट गया, मंच पर बोली लड़खड़ा गई, चयन नहीं हुआ। पर असफलता नतीजा नहीं है, नतीजे की व्याख्या है। “मैं अनुत्तीर्ण हुई” एक तथ्य है। “मैं किसी लायक नहीं” एक कहानी है जो हम खुद को सुनाते हैं। तथ्य बदला नहीं जा सकता, कहानी बदली जा सकती है।
दुनिया के हर समाज ने लड़कियों के लिए ‘सफलता’ की परिभाषा पहले से लिख रखी है। कहीं सफलता का मतलब है चुप रहना। कहीं इसका मतलब है गोरा दिखना। कहीं इसका मतलब है समय से विवाह करना। कहीं इसका मतलब है सबकी हाँ में हाँ मिलाना।
जब लड़की इस परिभाषा से बाहर कदम रखती है, तो उसे ‘असफल’ का नाम दे दिया जाता है। जबकि असली असफलता तो उस परिभाषा में है जो आधी आबादी के पंख काट देती है।
अफगानिस्तान में जब लड़कियों के स्कूल बंद किए गए, तो एक लड़की ने दीवार पर कोयले से अक्षर लिखने शुरू किए। उसने कहा, “दीवार मेरी कॉपी है, कोयला मेरा कलम”। क्या वह असफल थी ? नहीं। असफल वह वह नहीं बल्कि, व्यवस्था थी जो किताब से डर गई।
युगांडा में जब एक किशोरी को माहवारी के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा, तो उसने केले के रेशे से पैड बनाना सीखा। आज वह अपने गाँव की हर लड़की को स्कूल वापस ला चुकी है। क्या वह असफल थी ? नहीं। असफल वह चुप्पी थी जो इस विषय पर सदियों से थी।
इसलिए पहला काम है शब्दकोश बदलना। असफलता का अर्थ ‘अंत’ नहीं है। असफलता का अर्थ है ‘अभी नहीं’। नदी जब चट्टान से टकराती है तो रुकती नहीं, मुड़ती है। बीज जब मिट्टी में दबता है तो मरता नहीं, जन्म लेता है। तुम्हारा गिरना तुम्हारे जन्म का हिस्सा है।
उम्मीदों का अदृश्य बोझ
लड़की पैदा होते ही उसके कंधों पर कई उम्मीदें रख दी जाती हैं। “सुशील बनना”, “सुंदर दिखना”, “सबका ध्यान रखना”, “कुल का नाम रखना”। लड़का गिरे तो कहते हैं “लड़का है, सीख जाएगा”। लड़की गिरे तो कहते हैं “लड़की है, संभलकर चल”। यह दोहरा मापदंड ही वह अदृश्य बोझ है जो पीठ को झुका देता है।
मिस्र की मरियम को दौड़ना पसंद था। जब वह गली में दौड़ती तो लोग कहते, “लड़कियाँ उछलती अच्छी नहीं लगतीं”। मरियम ने दौड़ना नहीं छोड़ा। वह भोर से पहले उठती, अँधेरे में दौड़ती। आज वह अपने शहर की पहली महिला खेल-प्रशिक्षक है।
पेरू की लूज़ को पहाड़ चढ़ना था। गाँव ने कहा, “चोट लगेगी, फिर कौन ब्याहेगा”। लूज़ ने चोट की परवाह नहीं की। आज वह पर्वत-गाइड है और दूसरी लड़कियों को रस्सी बाँधना सिखाती है।
ये कहानियाँ बताती हैं कि उम्मीदें रस्सी हैं। अगर तुम उन्हें अपनी पतंग से बाँध लो, तो वे तुम्हें उड़ने में मदद करेंगी। अगर तुम उन्हें अपने गले से बाँध लो, तो वे तुम्हारा दम घोंट देंगी। चुनाव तुम्हारा है।
अगली बार जब कोई कहे, “हमने तुमसे यह उम्मीद नहीं की थी”, तो धीरे से पूछना, “क्या आपने कभी मेरी उम्मीद पूछी ?” क्योंकि जब तक तुम दूसरों की उम्मीद का बोझ ढोती रहोगी, तुम्हारे अपने सपने के लिए जगह नहीं बचेगी।
डर का व्याकरण
डर सबसे पुराना शिक्षक है। जब जंगलों में जीवन था, तो डर ने ही हमें ज़िंदा रखा। पर अब जंगल शहर बन गए, शेर विचार बन गए, और डर हमारे कमरे में रहने लगा। “लोग क्या कहेंगे”, “फिर से फेल हो गई तो”, “माँ-बाप का सिर झुक जाएगा”, ये नए शेर हैं। ये खून नहीं पीते, हिम्मत पीते हैं।
दुनिया के कई देशों में हुए अध्ययन कहते हैं कि किशोरियों में बेचैनी, घबराहट और उदासी की दर किशोरों से अधिक है। कारण सिर्फ शरीर के बदलाव नहीं हैं। कारण है वह संदेश जो हर दिन मिलता है, “तुम्हारी गलती सिर्फ तुम्हारी नहीं है, पूरे परिवार की है”। इसलिए लड़की परीक्षा में नहीं, परीक्षा के बाद वाले व्यवहार से डरती है। पर डर का भी एक व्याकरण है।
पहला नियम, डर को नाम दो। बिना नाम का डर भूत होता है। नाम दे दो तो वह इंसान बन जाता है, और इंसान से बात की जा सकती है। कागज़ लो। लिखो,0 “मैं किससे डरती हूँ ?”
फिर लिखो, अगर वह हो गया तो सबसे बुरा क्या होगा ? फिर लिखो, “क्या मैं वह सबसे बुरा सह सकती हूँ ?” तुम देखोगी कि नब्बे प्रतिशत डर सिर्फ छाया है। और जो दस प्रतिशत सच है, वह भी समय के साथ फीका पड़ जाता है।
दूसरा नियम, डर को मेहमान समझो, मालिक नहीं। तुर्की की एक लोकोक्ति है, “डर को अगर सिर पर बिठाओगे, तो वह ताज बन जाएगा”। उसे ज़मीन पर रखो। कैसे? पाँच तक गिनो और शरीर को हिलाओ। पानी पियो। दरवाज़ा खोलो। टहलो। जब शरीर चलता है, तो दिमाग का खतरे वाला बटन बंद होता है।
तीसरा नियम, डर की उम्र कम होती है। वह पहली दहाड़ में बड़ा लगता है। दूसरी दहाड़ में थोड़ा छोटा। तीसरी में सिर्फ गुर्राहट। तुम बस पहली दहाड़ में भागो मत। खड़ी रहो। देखो। डर खुद ही सिकुड़ जाएगा।
खुद से मित्रता : माफ़ी का मरहम
हम दूसरों के ज़ख्म पर फूँक मारते हैं। “कोई बात नहीं”, “सब ठीक हो जाएगा”, “तू तो शेरनी है”। पर जब खुद का दिल छिलता है तो हम नमक बन जाते हैं। “तू ही गलत थी”, “तेरा ही कसूर है”, “तुझसे न हो पाएगा”। हम खुद की सबसे बड़ी दुश्मन कब बन जाती हैं, पता ही नहीं चलता।
क्यों ? क्योंकि हमें सिखाया गया है कि खुद को माफ़ करना मतलब गलती को गले लगाना। जबकि माफ़ी का मतलब है सज़ा पूरी करना। तुमने मेहनत की, फिर भी परिणाम नहीं आया। अब खुद को कब तक जेल में रखोगी ? जेल में बैठकर कोई इमारत नहीं बनती।
अफ्रीका का ‘उबुन्तु’ दर्शन कहता है, “मैं हूँ क्योंकि हम सब हैं”। इसका एक अर्थ यह भी है कि जब तक मैं खुद से नरमी नहीं बरतूँगी, दूसरों से कैसे बरतूँगी? जब तुम खुद को माफ़ करती हो, तो तुम अपने अंदर के उस बच्चे को गोद में उठाती हो जो गिर गया था। उसे डाँटती नहीं, सहलाती हो। और सहलाने से ही घाव भरते हैं।
एक काम करो। आज रात ‘एक साल पहले वाली तुम’ को पत्र लिखो। उसे बताओ कि तुमने उसकी रातें देखी थीं, जब वह छत को तकती थी। तुमने उसकी सुबहें देखी थीं, जब वह ज़बरदस्ती मुस्कुराती थी।
तुमने उसकी कोशिश देखी थी, जो किसी ने नहीं देखी। और आज तुम उसे कहती हो, “तू बरी है। तूने अपना सौ प्रतिशत दिया था। अब हम आगे चलेंगी”। यह पत्र जादू है। जब तुम खुद की गवाही बन जाती हो, तो दुनिया की अदालत की कीमत गिर जाती है।
फिर से उठने के चार स्तंभ
बच्चा जब चलना सीखता है तो गिरने को उत्सव मानता है। हर गिरने पर ताली बजती है, “शाबाश, फिर से”। हम बड़े होकर ताली भूल जाते हैं। हमें फिर से सीखना होगा।
पहला स्तंभ, ठहरो और टूटो। समाज कहता है, “मजबूत लड़की रोती नहीं”। यह सबसे बड़ा झूठ है। मजबूत लड़की रोती है, पर रोने के बाद आँख पोंछती है। अपने दुख को समय दो। दो दिन, सात दिन, पंद्रह दिन। पर तारीख तय करो। उस तारीख के बाद बिस्तर छोड़ना है। घाव को हवा लगेगी तभी वह भरेगा।
दूसरा स्तंभ, नाटक से तथ्य को अलग करो। “मैं बेकार हूँ” नाटक है। “मैंने अंतिम इकाई दोहराई नहीं थी” तथ्य है। तथ्य से योजना बनती है। नाटक से सिर्फ नींद उड़ती है। अपनी असफलता की रिपोर्ट बनाओ। क्या, कब, क्यों, कैसे। डॉक्टर जब रोग का नाम जान लेता है, तभी दवा देता है।
तीसरा स्तंभ, सपना मत बदलो, सीढ़ी बदलो। अक्सर हम हारते ही मंज़िल छोटी कर लेते हैं। “वकील नहीं बन पाई, कुछ और सही”। पर शायद कमी मंज़िल में नहीं, नक्शे में थी। नाव डूबे तो नाव बदलो, दरिया नहीं। नया शिक्षक, नया समय, नया तरीका खोजो। दुनिया के सारे आविष्कार ‘उसी सवाल का नया जवाब’ हैं।
चौथा स्तंभ, कहानी फिर से लिखो। तुम्हारी ज़िंदगी की किताब में यह पन्ना कैसे छपेगा, यह तुम तय करोगी। “मैं हारी और खत्म” या “मैं हारी और मैंने खुद को पाया”। याद रखो, कॉमा का मतलब होता है ‘अभी बाकी है’। फुलस्टॉप मत लगाओ जब तक तुम खुद न चाहो।
साथी का चुनाव : कौन हाथ दे, कौन पैर खींचे
गिरने के बाद तीन तरह के लोग मिलेंगे। पहले, ‘साथ रोने वाले’। वे तुम्हारा दर्द समझेंगे, पर रास्ता नहीं दिखाएँगे। दूसरे, ‘रास्ता दिखाने वाले’। वे कम बोलेंगे, पर तुम्हारी उँगली पकड़कर अगला कदम रखवाएँगे। तीसरे, ‘घाव कुरेदने वाले’। वे कहेंगे, “हमने तो पहले ही कहा था”।
पहले वाले से मन हल्का करो, पर वहीं मत अटक जाओ। दूसरे वाले को अपना मार्गदर्शक बनाओ। तीसरे वाले से उतनी दूरी रखो जितनी आग से रखते हैं। हर कंधा सहारा नहीं होता। कुछ कंधे सिर्फ बोझ बढ़ाते हैं।
अगर घर में सुनने वाला न हो, तो बाहर खोजो। वह शिक्षिका जो तुम्हारी कॉपी पर हमेशा ‘शाबाश’ लिखती थी। वह दीदी जो कॉलेज जाती है और तुम्हें किताबें देती है। वह आंगनबाड़ी वाली दीदी, वह पुस्तकालय का दादा, वह ऑनलाइन समुदाय जहाँ लड़कियाँ एक-दूसरे को उठाती हैं।
मदद माँगना कमज़ोरी नहीं, समझदारी है। गाड़ी पंचर हो तो मिस्त्री के पास जाते हो ना ? मन पंचर हो तो मन का मिस्त्री खोजो।
और अगर कोई न मिले, तो खुद की सबसे पक्की सहेली बनो। आईने के सामने खड़े होकर कहो, “सुन, मैं हूँ ना तेरे साथ”। यह वाक्य सुनने में छोटा है, पर इसका असर पहाड़ हिला देता है।
छोटी जीत : हौसले की गुल्लक
टूटा हुआ हौसला एक दिन में नहीं जुड़ता। उसे एक-एक छोटी जीत से जोड़ना पड़ता है।
हर रात तीन छोटी जीत लिखो। बहुत बड़ी नहीं। “आज समय पर उठी”, “आज माँ को पानी दिया”, “आज दस पन्ने पढ़े”, “आज अजनबी को रास्ता बताया”, “आज पाँच मिनट आँख बंद करके साँस ली”।
तीस दिन में नब्बे जीत। जब दिमाग के पास नब्बे सबूत होंगे कि ‘मैं कर सकती हूँ’, तो वह सौवीं मुश्किल से नहीं घबराएगा।
रवांडा के एक गाँव में औरतों ने बचत समूह बनाया। हर हफ्ते थोड़ा-थोड़ा पैसा डालतीं। साल भर में इतना जमा हो गया कि उन्होंने सिलाई मशीन खरीद ली। आज पूरा गाँव उनके सिले कपड़े पहनता है। तुम्हारी छोटी जीतें भी वही सिक्के हैं। उन्हें छोटा मत समझो। बूँद-बूँद से ही समंदर बनता है।
जब दुनिया ‘नहीं’ कहे
कभी-कभी तुम सब सही करोगी, फिर भी दरवाज़ा बंद मिलेगा। कॉलेज कहेगा, “अंक पूरे नहीं”। दफ्तर कहेगा, “तजुर्बा नहीं”। रिश्तेदार कहेंगे, “अब उम्र निकल रही है”।
उस वक्त दो बात याद रखना। पहली, इनकार अंत नहीं, इशारा है। इशारा कि यह रास्ता तुम्हारा नहीं। दूसरी, अगर भीड़ तुम्हें कुर्सी न दे, तो अपनी चौकी बना लो।
ईरान की एक लड़की को विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया क्योंकि उसने सवाल पूछे। उसने घर में बैठकर ऑनलाइन पढ़ाई की। आज वह दुनिया भर की लड़कियों को विज्ञान पढ़ाती है। दीवार बंद हुई, उसने खिड़की से आसमान देख लिया।
तुम्हारे पास भी वह खिड़की है। डिग्री न मिले तो हुनर सीखो। नौकरी न मिले तो काम बनाओ। समझ न मिले तो अपना समूह बनाओ। दुनिया की हर बड़ी बदलाव किसी बड़े मैदान में नहीं, किसी छोटे कमरे में शुरू होता है, जब एक लड़की कहती है, “अब बस”।
धरती के हर छोर से उठती लड़कियाँ
मलाला के सिर में गोली लगी, पर उसकी आवाज़ नहीं रुकी। वह कहती है, “एक किताब, एक कलम, एक बच्ची और एक शिक्षक दुनिया बदल सकते हैं”। सोमालिया की इफरा ने बचपन में हिंसा देखी।
उसने हथियार नहीं उठाए, आवाज़ उठाई। आज उसकी वजह से हज़ारों बच्चियाँ सुरक्षित हैं। सीरिया की मुज़ून ने शरणार्थी तंबू में स्कूल चलाया। वह मानती है, “युद्ध किताब से डरता है”।
नेपाल की सपना ने बाल-विवाह से इनकार किया। पंचायत के सामने खड़ी हुई। आज वह वकील है और दूसरी लड़कियों का केस लड़ती है। मणिपुर की मैरी कॉम से कहा गया, “मुक्केबाज़ी मर्दों का खेल है”। उसने पाँच बार दुनिया जीतकर जवाब दिया।
इन सबकी भाषा अलग, देश अलग, धर्म अलग। पर धड़कन एक, “मैं रुकूँगी नहीं”।
अंतिम बात : तुम अल्पविराम हो, पूर्णविराम नहीं
तुम्हारी अंकसूची, तुम्हारा टूटा हुआ रिश्ता, तुम्हारा ठुकराया गया सपना, ये सब तुम्हारी किताब का एक अनुच्छेद है, पूरी किताब नहीं। और अनुच्छेद के अंत में पूर्णविराम नहीं, अल्पविराम लगाओ। अल्पविराम का अर्थ है ‘कहानी अभी बाकी है’।
रुकना हार है, सीखना जीत। माफ़ करना कमज़ोरी नहीं, ताकत है। डरना मनुष्य होना है, डर के आगे झुक जाना चुनाव है। और उठना सिर्फ तुम्हारा अधिकार नहीं, तुम्हारा कर्तव्य है, अपने लिए, और उन करोड़ों लड़कियों के लिए जो तुम्हारी पीठ देखकर चलेंगी।
आज रात चाँद को देखना। वह रोज़ घटता-बढ़ता है, पर चमकना नहीं छोड़ता। तुम भी चाँद हो। घटो, बढ़ो, पर बुझो मत।
कल जब सूरज उगेगा, वह तुमसे तुम्हारा कल नहीं पूछेगा। वह बस उजाला देगा। तुम भी बस चलो। एक कदम। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
क्योंकि तुम सिर्फ किसी की बेटी नहीं हो। तुम सिर्फ किसी की बहन नहीं हो। तुम सिर्फ किसी की छात्रा नहीं हो। तुम एक लौटती हुई लहर हो। और लहरें जब लौटती हैं, तो किनारा नया बना देती हैं।
तुम्हारी कहानी अभी अधूरी है। और सबसे सुंदर पन्ना वह है जो तुम कल लिखोगी, गिरने के बाद, उठने के बाद, जीतने के बाद।
उठो... गहरी साँस लो.... चलो....
क्योंकि एक लड़की का उठना, पूरी दुनिया का उठना होता है। और दुनिया तुम्हारे उठने का इंतज़ार कर रही है।
लेखक मनोज कुमार भट्ट, कानपुर
