"व्यस्तता का भ्रम...जीवन की सरलता में छिपा संतुलन" "The Illusion of Busyness... Finding Balance in Life’s Simplicity"
व्यस्तता का भ्रम....एक सामाजिक पड़ताल
लेखक: मनोज भट्ट
ब्लॉग: सामाजिक ताना-बाना
क्या सच में हम इतने व्यस्त हैं...?
आजकल प्रायः हर एक इंसान, एक दूसरे से, "बहुत व्यस्त हूं" वाक्य कहता मिलेगा। ये वाक्य इतना आम हो गया है कि जैसे यह हमारी पहचान बन गया हो।
यह तो स्पष्ट है कि जब इंसान व्यस्त है तो वह किसी न किसी तरह के कार्य में ही व्यस्त होगा, इसका सीधा सा अर्थ ये है कि निश्चय ही उसका परिणाम भी निकलता होगा...
सवाल यह है कि क्या हम सच में हम इतने व्यस्त हैं या केवल व्यस्त दिखना चाहते हैं ? यदि हम इतने ही व्यस्त हैं, तो समाज में उसका परिणाम क्या है, क्यों नहीं दिखता उसका सकारात्मक असर, क्यों रिश्ते कमजोर हो रहे हैं, क्यों संवाद घट रहा है और क्यों आत्म-संतोष दूर होता जा रहा है ?
यह लेख इसी ज्वलंत विषय पर एक गहन सामाजिक पड़ताल है, जो निश्चय ही सभी को सोचने पर मजबूर करेगा।
व्यस्तता की परिभाषा... भ्रम और सच्चाई
वास्तविक व्यस्तता वह होती है जिसमें व्यक्ति समय का सही उपयोग करता है, कार्यों को प्राथमिकता देता है, और परिणाम उत्पन्न करता है।
दिखावटी व्यस्तता वह होती है जिसमें व्यक्ति केवल व्यस्त दिखता है, लेकिन कार्यों की गुणवत्ता और सामाजिक योगदान नगण्य होता है।
आज की दुनिया में दिखावटी व्यस्तता एक फैशन बन गई है। लोग "बिजी" कहकर खुद को महत्वपूर्ण साबित करना चाहते हैं, लेकिन उनके जीवन में न अनुशासन दिखता है, न संतुलन।
बालक, किशोर, युवा और बुजुर्गों की व्यस्तता पर विस्तार से विचार करने पर कई पहलुओं की तस्वीर स्पष्ट होती है।
1. बच्चों की व्यस्तता: बचपन खोता जा रहा है...
बचपन का मतलब होता है खेल, कल्पना, और सीखने की आज़ादी। लेकिन आज के बच्चे स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग, और स्क्रीन में व्यस्त हैं, या यूं कहा जाए कि इतने उलझ गए हैं कि उनका बचपन कहीं खो गया है।
10 साल का एक बच्चा सुबह 6 बजे उठता है, स्कूल जाता है, फिर कोचिंग, फिर होमवर्क। खेलने का समय नहीं, परिवार से संवाद नहीं। क्या यह व्यस्तता उसे बेहतर इंसान बना रही है या एक मशीन ?
उपरोक्त कार्य अनुसार बच्चों की व्यस्तता के कारण...
- खेल का समय घट रहा है
- रचनात्मकता कम हो रही है
- संवाद की क्षमता कमजोर हो रही है
दुःखद पहलू ये है कि इस तथा कथित व्यस्तता के विपरीत परिणाम देखकर भी हम अपने बच्चों को इससे बचा भी नहीं पा रहे हैं।
आइए समाधान की दिशा में एक कदम बढ़ाए, उन्हें...
- खेलने और सोचने का समय दें
- प्रकृति से जोड़ें
- परिवार में संवाद को बढ़ावा दें
किशोरावस्था वह समय होता है जब वह अपनी पहचान बनाता है। लेकिन आज के किशोर सोशल मीडिया, करियर की दौड़, और दिखावे में इतने उलझ गए हैं कि आत्मचिंतन का समय ही नहीं बचता।
16 साल की एक लड़की फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर दिनभर एक्टिव रहती है, लेकिन घर में किसी से बात नहीं करती। क्या यह व्यस्तता उसे आत्मनिर्भर बना रही है या अकेला ?
इस समस्या के निम्न दुष्परिणामों से कौन अनभिज्ञ होगा...
- आत्म-संवाद की कमी
- मानसिक तनाव
- रिश्तों में दूरी
इन समस्याओं का इस तरह समाधान करें जैसे ...
- डिजिटल डिटॉक्स करें
- डायरी लेखन या कविता से जुड़ें
- परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करें
3. युवा वर्ग: करियर की दौड़ में खोती संवेदनाएं...
युवाओं की व्यस्तता नौकरी, स्टार्टअप, सोशल मीडिया, और "नेटवर्किंग" में है। वे भी दिनभर काम करते हैं, लेकिन आत्म-संतोष नहीं मिलता।
एक 25 वर्षीय युवा दिनभर ऑफिस में, रात को मोबाइल पर। रिश्तों के लिए समय नहीं, आत्मचिंतन के लिए जगह नहीं।
तो ऐसे में विभिन्न समस्या अवश्यंभावी है।
- उत्तेजित होना
- अकेलापन
- जीवन का उद्देश्य खोना
समाधान के लिए भी सीधे सरल उपाय अपनाए जा सकते हैं...
- समय प्रबंधन सीखें
- सप्ताह में एक दिन "निर्व्यस्त समय" रखें
- समाज सेवा या रचनात्मक कार्यों से जुड़ें
4. बुजुर्गों की व्यस्तता: अकेलेपन की चुप्पी...
अब तो आजकल बुजुर्ग भी कहते पाए जाते हैं, "हम भी व्यस्त हैं"। उनकी व्यस्तता टीवी, पूजा, पुरानी यादों में खोए रहना आदि में है। लेकिन यह व्यस्तता नहीं, अकेलापन है।
एक उदाहरण देखें, एक 70 वर्षीय वरिष्ठ, दिनभर टीवी इसलिए देखते हैं, क्योंकि बच्चे उनसे बात नहीं करते और उनकी इस तरह की व्यस्तता से उपजती है, कुछ इस तरह की समस्याएं।
- संवाद की कमी
- उपेक्षित महसूस होना
- मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर
बुजुर्गों की उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए पूरे सामाजिक ताना-बाना तंत्र की जिम्मेदारी है...
- परिवार में बुजुर्गों को सम्मान दें
- उन्हें अपना अनुभव और अपनी कहानियाँ सुनाने का अवसर दें
- उन्हें सामुदायिक कार्यक्रमों से जोड़ें
सामाजिक परिणाम: व्यस्तता के बावजूद ठहराव
गंभीर विचारणीय प्रश्न, सच में हम सभी इतने व्यस्त हैं ? तो...
- क्यों समाज में नैतिक पतन बढ़ रहा है ?
- क्यों परिवारों में संवाद घट रहा है ?
- क्यों देश की रचनात्मकता स्थिर है ?
उत्तर स्पष्ट है...
- "हम व्यस्त नहीं हैं, हम भ्रम में हैं। हम समय का सही उपयोग नहीं कर रहे।"
- "मैं व्यस्त हूं" कहना अब एक प्रचार शैली बन गया है।
यह एक आत्म-सुरक्षा कवच है, जिससे लोग संवाद, जिम्मेदारी, और आत्ममंथन से बचते हैं।
यह एक सामाजिक भ्रम है, जो हमें अपने वास्तविक योगदान से दूर करता है।
तभी यह प्रश्न उठता है कि क्या आजकल की तथाकथित "व्यस्तता", एक सामाजिक मुखौटा है ?
अंत में एक बार पुनः लेख संबंधित समस्याओं के समाधान हेतु कुछ सिद्धांतों को अपनाकर अपनी अपनी व्यस्तता को सार्थक बनाएं...
1. बच्चों को खेलने और सोचने का समय दें
2. किशोरों को आत्मचिंतन और रिश्तों की अहमियत समझाएं
3. युवाओं को समय प्रबंधन और समाज सेवा से जोड़ें
4. बुजुर्गों को संवाद और सम्मान दें
5. हर व्यक्ति दिन में 30 मिनट "निर्व्यस्त समय" (काम और जिम्मेदारियों से मुक्त ) निकाले, जहां वह केवल "सोच" सके...
"सच्ची व्यस्तता वह है जो समाज को दिशा दे, परिवार को ऊर्जा दे, और आत्मा को शांति दे।"
लेखक की अपील, व्यस्तता का फैशन अब थमना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि समय की कमी नहीं, प्राथमिकताओं की कमी है। यदि हम सच में व्यस्त हैं, तो उसका प्रभाव हमारे घर, समाज, और देश में दिखना चाहिए। अन्यथा, यह केवल एक सामाजिक अभिनय है...🙏
उपरोक लेख से पूर्व लेखक के द्वारा, बुजुर्गों की सामाजिक स्थिति, किशोरों के लिए सामाजिक मार्गदर्शिका और भारत में बुजुर्गों की समस्याएँ पर विचार किया गया। धन्यवाद।
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मनोज भट्ट कानपुर ...

Ek zaroori lekh 👍
जवाब देंहटाएंये लेख आज की कटु सच्चाइयों में से एक है। जो सभी आयु वर्ग के लिए प्रासंगिक भी।
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