सोशल मीडिया और AI फर्जी सामग्री: सामाजिक चेतना की पुकार | Social Media & AI Fake Content: A Call for Awareness
सोशल मीडिया और AI जनित फर्जी सामग्री, एक घातक राष्ट्रीय और सामाजिक विपत्ति...
लेख-- मनोज भट्ट, कानपुर
विवेचना -- गायत्री भट्ट
श्री मनोज भट्ट द्वारा लिखित यह लेख उनके द्वारा अपने फेसबुक पेज पर दिनांक १२ मई २०२५ को प्रकाशित किया गया था। वही लेख नए सिरे से विवेचना कर,"सामाजिक ताना-बाना"ब्लॉग में प्रस्तुत हो रहा रहा है। आज इस लेख की प्रासंगिकता भारतीय समाज के हर वर्ग के लिए महत्वपूर्ण है।
एक नई वैश्विक चुनौती का उदय
वर्तमान डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने संवाद, सूचना और अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले हैं। परंतु इसी मंच पर एक नई और गंभीर सामाजिक विपत्ति जन्म ले चुकी है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) द्वारा निर्मित फर्जी सामग्री का प्रसार। यह संकट केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और भावनात्मक स्तर पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है।
आज जब डीपफेक वीडियो, बनावटी तस्वीरें और भ्रामक समाचार मिनटों में वायरल हो जाते हैं, तो सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। यहां तक कि पढ़े-लिखे लोग भी भावनात्मक रूप से सक्रिय प्रतिक्रिया देते हैं, बिना तथ्य की पुष्टि किए। यह प्रवृत्ति समाज में अशिष्ट भाषा, कटुता और विभाजन को जन्म दे रही है।
AI जनित फर्जी सामग्री का स्वरूप और विस्तार...
AI की प्रगति ने टेक्स्ट, चित्र, वीडियो और आवाज की नकल इतनी सटीक बना दी है कि आम व्यक्ति के लिए असली और नकली में फर्क करना कठिन हो गया है। इसका एक बहुचर्चित उदाहरण सबके सामने है।
नवंबर 2023 में अभिनेत्री रश्मिका मंदाना का एक डीपफेक वीडियो वायरल हुआ, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया और सरकार को IT नियमों में संशोधन के लिए प्रेरित किया।
- डीपफेक वीडियो में किसी व्यक्ति की आवाज और चेहरा बदलकर झूठी घटनाएं दर्शाई जाती हैं।
- फोटोशॉप और जनरेटिव AI से बनाई गई तस्वीरें किसी भी घटना को गलत रूप में प्रस्तुत कर सकती हैं।
- भ्रामक समाचार AI द्वारा लिखे जाते हैं जो भावनात्मक भाषा में होते हैं और तेजी से फैलते हैं।
आज कल इनका उपयोग मुख्यतः राजनीतिक प्रचार, सामाजिक ध्रुवीकरण, व्यक्तिगत बदनामी और आर्थिक धोखाधड़ी तक में हो रहा है।
सामाजिक प्रभाव, बच्चों से बुजुर्गों तक...
इसे शीघ्रातिशीघ्र एक गंभीर चेतावनी के रूप में क्या जाना चाहिए, क्योंकि AI जनित फर्जी सामग्री का प्रभाव हर आयु वर्ग पर पड़ता है।
2025 में एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 64% सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने कम से कम एक बार फेक न्यूज़ को सच मानकर प्रतिक्रिया दी। क्योंकि...
- बच्चे और किशोर गलत आदर्शों और झूठी सूचनाओं से प्रभावित होते हैं।
- युवा वर्ग भावनात्मक रूप से उत्तेजित होकर कट्टर विचारों को अपनाने लगता है।
- बुजुर्ग व्हाट्सएप और फेसबुक पर वायरल सामग्री को सच मानकर भ्रमित हो जाते हैं।
तकनीक से अधिक मानसिकता की जिम्मेदारी...
इस संकट के पीछे तकनीक नहीं, बल्कि मानव व्यवहार की सोच से निकली विकृति मानसिकता है, क्योंकि...
- सोशल मीडिया एल्गोरिदम केवल वायरल और उत्तेजक सामग्री को बढ़ावा देते हैं।
- अत्यधिक जानकारी लोगों को थका देती है, जिससे वे बिना सोच-विचार के प्रतिक्रिया देते हैं।
- लोग समालोचनात्मक चिंतन की कमी के कारण भावनात्मक रूप से बह जाते हैं।
यह एक ऐसी डिजिटल मानसिकता का निर्माण कर रहा है, जहाँ बिना सत्य की पुष्टि करे तुरंत प्रतिक्रिया को महत्व दिया जाता है।
सामूहिक जागरूकता और नीति निर्माण ही समाधान
इस आधुनिक विपदा से निपटने के लिए समाज के सामूहिक प्रयास और सरकारी नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं। कुछ निम्नलिखित उपाय अपनाए का सकते हैं,जैसे...
1. डिजिटल साक्षरता का विस्तार
हर नागरिक को यह सिखाना होगा कि ऑनलाइन सामग्री की सत्यता की जांच कैसे करें, और AI जनित फर्जी सामग्री को पहचानना कैसे संभव है।
2. जागरूकता अभियान
सरकारी और सामाजिक संगठनों को मिलकर स्कूलों, कॉलेजों और पंचायतों में अभियान चलाने होंगे, जहाँ डीपफेक, फेक न्यूज और AI के खतरे को समझाया जाए।
3. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही
फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स को फर्जी सामग्री की पहचान और रोकथाम के लिए सख्त तंत्र विकसित करने होंगे। फैक्ट-चेकिंग, रिपोर्टिंग और कंटेंट मॉडरेशन को अनिवार्य करना होगा।
4. AI के नैतिक उपयोग की नीति
सरकारों को AI के नैतिक उपयोग के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने होंगे। फर्जी सामग्री बनाने वाले टूल्स पर नियंत्रण और दुरुपयोग करने वालों पर सख्त दंड सुनिश्चित करना होगा।
5. शिक्षा में समालोचनात्मक चिंतन का समावेश
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में मीडिया साक्षरता और समालोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा, ताकि अगली पीढ़ी सत्य और असत्य में फर्क करना सीख सके।
व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सतर्कता ही सुरक्षा
उपरोक्त उपायों के अलावा हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से सोशल मीडिया पर सतर्कता बरतनी होगी, जैसे ...
- किसी भी सामग्री को शेयर करने से पहले उसकी पुष्टि करें।
- भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से बचें और तथ्य आधारित संवाद को बढ़ावा दें।
- फर्जी सामग्री की रिपोर्टिंग करें और दूसरों को भी जागरूक करें।
यह हम सब की नैतिक जिम्मेदारी है, जो सामाजिक ताने-बाने को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।
लेखक की ओर से --
एक चेतावनी और एक आह्वान...
यह एक हम सबके लिए गंभीर चेतावनी है कि AI जनित फर्जी सामग्री एक अदृश्य लेकिन घातक विपत्ति है, जो समाज की सत्यनिष्ठा, सहिष्णुता और संवाद को कमजोर कर रही है।
जिसका नकारात्मक प्रभाव अपने राष्ट्र पर पड़ते दिख रहा है।
यदि हम अभी सतर्क नहीं हुए, तो यह संकट देश के जन मानस की मानसिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों को गंभीर खतरे में डाल सकता है, जो हमारा सामाजिक ताना-बाना छिन्न भिन्न कर देगा।
इसलिए एक आव्हान आवश्यक है कि हम तकनीकी समझ, नैतिक विवेक और सामाजिक चेतना को एक साथ लाकर इस विपदा का सामना करें।
यह केवल सरकार या तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। आइए, हम सब मिलकर सत्य, विवेक और सहिष्णुता की मशाल जलाएं, ताकि डिजिटल अंधकार में भी मानवता की रोशनी बनी रहे।
इस लेख की रचना, "AI जनित सामग्री का सामाजिक प्रभाव" और "सोशल मीडिया सहभागिता पर AI का प्रभाव" को आधार बनाते हुए की गई है...🙏
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मनोज भट्ट कानपुर ...
