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चप्पल की व्यथा, गाँव की पंचायत की अनोखी सुनवाई | Slipper’s Verdict, The Quirky Trial of the Village Panchayat


|यह चित्र और लेख ग्रामीण भारत की पंचायत व्यवस्था पर एक व्यंग्यात्मक झलक प्रस्तुत करता है। इसमें समाज की सच्चाई, परंपरा और हास्य का मेल दिखाई देता है। This painting and write-up present a satirical glimpse of the Indian Panchayat system, blending social reality, tradition, and humor."


 "एक अनोखी पंचायत जहाँ इंसान नहीं, चप्पल ने दिया समाज को आईना"

     कल रात को अचानक गांव से फोन आया कि गुड्डू भैया बहुत गंभीर समस्या है, पंचायत बैठी है। और जब हमने पूछा, "का हुआ ?"... जवाब मिला..."कुछ पूछौ ना, सुबह जल्दी तुम्हे आय का है बस ,बहुत जरूरी है"। पत्नी बोली , "का हुआ ?" हमने कहा, लगता है कि कोई मामला बड़ा गंभीर है।" 

      रात भर मैं सो नहीं पाया और सुबह जल्दी उठकर गांव की ओर चल दिया। गांव भी करीब आ गया, गांव के बाहर से ही गहमा गहमी का एहसास होने लगा। फिर 
जैसे ही अपने गांव में प्रवेश किया, भीड़ से पूछा कि काहे की भीड़ है तो कारण बड़ा अजीब पता चला, “चप्पल महोदय की जनहित याचिका" 

      अपने बड़बक पुरवा गांव की पंचायत भवन में आज खास बैठक बुलाई गई थी। भवन के बाहर ढोल-नगाड़े बज रहे थे। अंदर मंच पर चौधरी कालूराम ताव से बैठे थे, मानो खुद मुख्य न्यायाधीश हों, जैसे ही हमें देखा, जोर से चिल्ला कर बोले, आओ आओ गुड्डू भैया, यहां बगल में बैठो और एक कुर्सी में मुझे बैठा दिया। मेरे  बगल में गांव का सचिव कल्लू, हाथ में मोटी डायरी थामे, जैसे कोई कचहरी का बड़ा बाबू हो।

      सामने लकड़ी की बेंचों पर गांव के तमाम लोग बैठे थे, काफी मजमा था। नाई जगन, धोबी हरिराम, मास्टरनी पार्वती, हकीम साहब, किसान पन्नालाल, मौलाना साहब, पण्डित जी, ब्यूटी पार्लर वाली शीला, डॉक्टर मिश्रीलाल पत्रकारिता का शौक़ीन बबलू माईक लेकर खड़ा था, कुछ तेज किस्म के बच्चे और यहां तक की गांव का एक चोर छोटका भी साथियों संग बैठा था।

      सबकी नज़रें एक खास शख्स पर थीं,
चप्पल महोदय”, कंधे पर पट्टा डाले, पुरानी, पर चमकदार, और चेहरे पर आत्मविश्वास की पूरी पॉलिश।

तभी अचानक सचिव कल्लू चिल्लाया...
" सावधान, सब लोग शांत हो जाएं, अब बड़बक पुरवा गांव पंचायत की कारवाही शुरू की जाती है..."

    चौधरी कालूराम, गला खंखार कर तेज आवाज में बोले... “गांव की विशेष अदालत आज बैठी है। मामला  गंभीर है, चप्पल जोड़ी को कप्पल अवार्ड दिलाने का !
अब सुनवाई शुरू हो...”

गांव हंसी से गूंज उठा।

धोबी हरिराम बोला...
“चौधरी जी, अगर चप्पल भी पुरस्कार पाई ? तो फिर हमार धोबी घाट भी, ‘वॉटर पार्क’ कहलाए का चाही !”

भीड़ ठठाकर हंसी। 

"ऐ हरिराम...चुप ...पहले चप्पल महोदय को बोलने दो..."
चौधरी ने बीच में टोंका।

     चप्पल महोदय मंच पर आए और हाथ जोड़ बोले...
“मान्यवर और बड़बक पूरवा के नागरिकों !

    "इंसान लोग शादी-ब्याह में फोटो खिंचावत हैं, अपन अपन कपड़न के ब्रांड दिखावत हैं, औ फिर सोशल मीडिया पर  लिख देत हैं, "BestCouple".

    "पर असली और आदर्श कप्पल तो हम हैं, " दायां-बायां चप्पल"। हमेशा साथ, हमेशा बराबरी पर। एक पैर नंगा हो जाए तो दुनिया हंसत है। पर इंसानन के टूटे रिश्तन पर कोऊ नाहीं हंसत है। यह अन्याय है!”

पंचायत का माहौल गरमा गया और बहस शुरू हो गई...

मास्टरनी पार्वती बोली...

“बिलकुल सही कहत हो चप्पल भैया ! हम आपन स्कूलन मां तो नकल करत बच्चन पर डंडा चलाइत हन, पर हमरे घरन मां, हम सबकी अम्मा औ बाबू, आजौ हम पर चप्पल ही चलावत हैं..

नाई जगन भी बोला...
“यही से तो हम कहित हन कि भईया अब इंसानन के सुधार का असली ठेका चप्पलै के पास होय का चाही।”

तभी पत्रकार बबलू चिल्लाया...
“ब्रेकिंग न्यूज़ ! आज की बड़ी खबर, बुड़बक पूरवा की पंचायत में चप्पल बनने जा रही है, समाज सुधारक !”

चप्पल महोदय हाथ जोड़ कर बोले...
“हमरे बिना इंसान की हालत देखे हौ ?
बरसात मां नंगे पांव चलौ तो, फिसलकर अस्पताल पहुँच जाओ। गर्मी मां चलौ तो, एंबुलेंस बुलाए का पड़ जाए।
और आजकल की सबसे बड़ी बात, मां-बाप ?
बेटा अगर मोबाइल पर रातभर वीडियो देखे, तो ओका सुबह उठाए खातिर अलारम नाहीं, चप्पलै है।”

भीड़ ठहाकों से गूंज गई।

किसान पन्नालाल ताली बजा कर बोला...
“हमरे खलिहान मां भी धान की तबहीं कुटाई होत है जब सब, आपन आपन चप्पल उतार के काम में जुटत हैं। चप्पल पहिले उतरत है, काम बाद में शुरू होत है।”

अब आत्मविश्वास से भरे चप्पल महाशय नेता की तरह आगे बोले..
“हमने कितनी बुराइयों का इलाज किया है,
  • शराबी पति या बेटा, घर देर से लौटे, तो घरन मां सबसे पहिले चप्पल से स्वागत।
  • नेता पंचायत में वादा करके मुकर जाए, तो जनता चप्पल से याद दिलाए।
  • मोहल्ले में छेड़छाड़ हो, तो हमरी चारों तरफ से उड़ती जोड़ी से मनचलन की हवा निकल जाए।”
बीच में धोबी हरिराम बोला...
“और जब किरकिट मां हार जात हैं, तो टीवी पर भी तो चप्पल बरसत हैं !”

पूरा पंचायत भवन हंसी से गूंज उठा।

चप्पल बाबू फिर गर्व से बोले ...
  • “राज कपूर ने हमार बिरादरी लिए गाना गाया, मेरा जूता है जापानी !
  • रामायण में भरत जी ने पांव में हमें नहीं, पर सिंहासन पर हमरे बड़े भाई खड़ाऊं को रखा"।
तो अब आपै लोग बताओ, हम काहू से कम हैं का ?”

मास्टरनी जी बोली...
“अरे सही कहत हौ। स्कूलन मां गुरु जी तो किताबन का आदर, जूता उतार के ही करावत हैं ना ? मतबल, हर आदर, सम्मान की जड़ मां चप्पलै है।

पत्रकार बबलू ने माइक, चप्पल महाशय की ओर आगे कर दिया...
“तो अब क्या चप्पल आंदोलन होगा ?”

चप्पल महोदय गरजे...
“हां ! अगर अब भी सम्मान न मिला, तो हम "पैर-त्यागो आंदोलन" करेंगे। फिर देखना, पूरा देश नंगे पैर भागेगा !”

तभी गांव का छोटका चोर अपने चेलों संग जोर जोर से रो कर चिल्लाने लगा...
“अरे बर्बाद हो गई हमार जिंगदी। अगर सब नंगे पैर हुई गए, तो हम चप्पल चोरन का धंधा का होई ?”

और ब्यूटी पार्लर वाली शीला हंस पड़ी..
“लेकिन हमार धंधा त बूम कर जाई। सब नंगे पैर घूमिहैं, तो, बिना पेडिक्योर कराए सबका कैसे चैन पड़ी।

डॉक्टर मिश्रीलाल भी मुस्कराए और शीला से बोले, 
“हमरे लिए भी मजा है। नंगे पैर मतबल फोड़े-फुंसी वाले बढ़ जहिएं। और हमरे हस्पताल के सामने लंबी लाइन लग जाई...

चौधरी कालूराम जोर-जोर से खांसने लगे...

सचिव कल्लू चिल्लाया...
शांत। सब लोग शांत हो जाएं, अब सब लोग बड़बक पुरवा पंचायत का नियाये सुनौ...

चौधरी कालूराम ने मूंछ पर ताव दिया और गंभीर आवाज में बोले...
“ सबका पूरा तर्क सुनै के बाद, पंचायत अपना फैसला सुनाती है..

"चप्पल ही असली कप्पल होगी।" 
इंसान चाहे आपस मां कितानौ लड़ ले, झगड़ ले, चाहे सब कुछ छोड़ दे, पर चप्पल नाही छोड़ सकत।
क्योंकि चप्पल बिना पैर अधूरा। इसीलिए बड़बक पूरवा पंचायत, सरकार को सिफारिश भेजेगी कि "नेशनल कप्पल अवार्ड" में चप्पल जी को भी जगह मिले।”

भीड़ ने तालियां बजाईं। लड्डू बांटे।

तभी सभा खत्म होते-होते मास्टरनी पार्वती मंच पर आईं और बोली...
“देखा भाई, यह चप्पल सिर्फ पैरों की नहीं,
पूरे समाज की तस्वीर है। अब आज से ही, जहां भी किसी की भी, कोई गलती मिलेगी, वहां हम सबकी चप्पल चलेगी। चाहे भ्रष्ट नेता हो, शराबी पति, या आलसी बेटा।”

ताली बजाकर, सब एक स्वर में हंसते-हंसते बोले...
“सही कहा ! समाज सुधरेगा, तो चप्पल की छाप से ही!”

     अंत में बड़बक पुरवा की पंचायत से एक आवाज गूंजी, “सच्चा कप्पल वही है जो हर हाल में साथ रहे।
और वह है, चप्पल।”

     बच्चों की एक टोली जोर जोर से नारे लगाते मेरे पास से निकली ...."अपनी चप्पल असली कप्पल "
"असली कप्पल अपनी चप्पल "

     और हम किंकर्तव्यविमूढ़ बन, ठगे से वापस घर, शहर की ओर... बरबस एक गाना मन में बजने लगा हुए...
ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ, जब हुआ, तब हुआ, तो छोड़ो ये न सोचो, 
ये क्या हुआ...

चित्र परिकल्पना एवं लेखक मनोज भट्ट, कानपुर 

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