बुढ़ापे में प्यार: मेरे 60 साल के पिता की दूसरी शादी की भावुक दास्ताँ

"60 साल के पिता जी दूसरी बारात में घोड़ी पर हँसते हुए, 40 साल का बेटा आंसुओं से रोता हुआ साथ बैठा है, बाराती नाचते-गाते | 60-year-old father laughing on horse in second wedding procession, 40-year-old son crying beside him, family dancing in sunset background"

पिता जी की शादी : हास्य सफर, भावनाओं के साथ

आज का दिन मेरे जीवन का सबसे अजीब, सबसे मजेदार और सबसे भावुक दिन था। मेरे पिता जी, जो 60 साल के हो चुके हैं, आज शादी कर रहे थे। हाँ, आपने सही सुना, शादी! और मैं, उनका 40 साल का बेटा, बारात में सबसे आगे खड़ा था, घोड़ी पर चढ़े पिता जी को देखकर सोच रहा था कि कहीं यह सपना तो नहीं। 

मेरी माँ, जिन्हें मैं कभी जान नहीं पाया, मेरे जन्म के साथ ही इस दुनिया से चली गई थीं। पिता जी ने मुझे अकेले पाला, बड़ा किया और अब वे अपने बुढ़ापे का सहारा ढूंढ रहे थे। नई माता जी आ रही थीं, और पूरा परिवार उनकी खुशी में शामिल था। लेकिन मेरे मन में क्या चल रहा था ? 

चलिए, मैं आपको पूरी कहानी सुनाता हूँ, एक ऐसी कहानी जो हँसी से शुरू होती है, भावनाओं में डूबती है, और फिर हँसी के साथ खत्म होती है। यह हास्य रचना 3000 शब्दों से ज्यादा की है, तो चाय की प्याली थामिए और तैयार हो जाइए एक रोलरकोस्टर राइड के लिए!

जोर का झटका, धीरे से – जब पिता जी ने ऐलान किया

सब कुछ उस दिन शुरू हुआ जब मैं ऑफिस से घर लौटा। मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, 40 की उम्र में भी सिंगल, और घर में पिता जी के साथ रहता हूँ। हमारा घर दिल्ली की एक पुरानी कॉलोनी में है, जहाँ पड़ोसी अभी भी एक-दूसरे की जिंदगी में दखल देते हैं। 

मैं दरवाजा खोलकर अंदर आया, तो पिता जी सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उनका चेहरा कुछ अजीब सा चमक रहा था, जैसे कोई लॉटरी जीत ली हो। "बेटा, बैठो," उन्होंने कहा, और मैं बैठ गया।

"क्या बात है पापा ? आपकी तबीयत तो ठीक है न ?" मैंने पूछा, क्योंकि पिछले हफ्ते उन्होंने ब्लड प्रेशर की दवा भूलने की शिकायत की थी।

"तबीयत से ज्यादा कुछ है," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। "मैं शादी करने वाला हूँ।"

मैं हँस पड़ा। "क्या मजाक कर रहे हो पापा ? किसकी शादी ?"

"अपनी", उन्होंने सीरियस होकर कहा। "तेरी शर्मा आंटी ने एक रिश्ता सुझाया है। उनका नाम सुनीता है, 55 साल की हैं, विधवा हैं और बहुत अच्छी हैं।"

मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। 60 साल के पिता जी शादी ? मैंने सोचा, यह तो कोई कॉमेडी शो का प्लॉट है! लेकिन फिर याद आया, माँ के जाने के बाद पिता जी ने कभी दूसरी शादी की बात नहीं की। उन्होंने मुझे पढ़ाया, नौकरी लगवाई, और खुद अकेले रहे। अब अचानक ? मैंने हँसते हुए कहा,"पापा, इस उम्र में शादी ? मैं 40 का हूँ, आप 60 के, यह तो उल्टा लग रहा है!" लोग क्या कहेंगे ?

पिता जी ने पहले तो गुस्से से देखा, लेकिन फिर हँस दिए। "बेटा, उम्र क्या है ? ये तो नंबरों का एक खेल है , बस दिल जवान होना चाहिए। तू खुद तो शादी कर नहीं रहा, तो मैने सोचा, क्यों न मैं ही कर लूँ। बुढ़ापे में सहारा जो चाहिए।"

उस रात मैं सो नहीं पाया। हास्य था कि पिता जी अब दूल्हा बनेंगे, लेकिन भावना थी... माँ की यादों की। मैंने कभी माँ को देखा नहीं, लेकिन पिता जी से उनकी कहानियाँ सुनी थीं, कैसे वे हँसती, कैसे घर संभालती थीं।

अब नई माता जी ? क्या वे माँ की जगह ले पाएँगी ? खैर...  लेकिन परिवार खुश था। मेरी बुआ जी, चाचा जी, सबने फोन करके बधाई दी। "अरे, तेरे पापा अब सेटल हो जाएँगे"। मैंने सोचा, हाँ... लेकिन मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ, ये सोचा है किसी ने ?

शादी की तैयारी 

अगले दिन से तैयारी शुरू हो गई। पिता जी ने मुझे अपने साथ शॉपिंग पर ले जाने का आदेश दिया। हम बाजार तो गए। लेकिन वहाँ का दृश्य देखकर मैं हँस-हँसकर लोटपोट हो गया। पिता जी शेरवानी ट्राई कर रहे थे, एक लाल रंग की, जो उनके पेट पर टाइट हो रही थी। "पापा, यह तो आप पर फिट नहीं," मैंने कहा।

अपनी सांस खींच कर बोले "देखो फिट क्यों नहीं ? अभी मैं जवान हूँ!" उन्होंने कहा और दुकानदार हँस दिया। फिर उन्होंने सेहरा ट्राई किया, जो उनके चश्मे पर अटक गया। "अरे, यह तो ब्लाइंड डेट जैसा लग रहा है," मैंने चुटकी ली। पिता जी ने मुझे आंखे बड़ी कर घूरा, लेकिन फिर, खुद भी हँस दिए। 

शॉपिंग के दौरान बातचीत में उन्होंने सुनीता आंटी के बारे में बताया, वे एक स्कूल टीचर हैं, दो बच्चे हैं, जो शादीशुदा हैं और वे पिता जी से मैट्रिमोनियल साइट पर मिली थीं। 

है न मजेदार बात, जी हाँ, 60 साल के पिता जी अब ऑनलाइन डेटिंग कर रहे थे! मैंने सोचा, यह तो मॉडर्न इंडिया है, मेरे पिता जी टिंडर पर नहीं, लेकिन shaadi.com पर सक्रियता दिखा गए।

पर अगले ही पल भावनात्मक रूप से मुझे लगा कि पिता जी का अकेलापन... जो मुझे कभी समझ नहीं आया। मैं काम में व्यस्त रहता था, लेकिन वे घर में अधिकांश समय अकेले टीवी देखते थे। लेकिन अब वे खुश लग रहे थे और इसीलिए मैं भी उनकी खुशी में शामिल होना चाहता था। 

लेकिन....लेकिन मन ही मन में एक टीस थी, एक यक्ष प्रश्न मेरे दिल ओर दिमाग को शून्य कर रहा था और मै किसी से कुछ कह भी नहीं पा रहा था, कि क्या मेरी माँ की फोटो अब दीवार पर अकेली रहेगी ?

एक मजेदार घटना 

हास्य का एक बड़ा मजेदार सीन तब हुआ जब हमलोग सुनीता आंटी के घर गए, रिश्ता पक्का करने। आंटी का घर नोएडा में था और हम ट्रैफिक में फँस गए। पिता जी किसी नए लड़के की तरह घबरा रहे थे, "कहीं लेट न हो जाएँ। "मैंने कहा," अरे पापा, पहली डेट पर लेट होना फैशन है!" 

किसी तरह हम लोग वहाँ पहुँचे। आंटी ने चाय परोसी, और पिता जी से घबराहट में चाय गिर गई, शर्ट पर। "ओह नो!" अचानक आंटी के मुंह से निकला, हम सब जोर से सब हँस पड़े और आंटी शर्मा गई। 

पहली मुलाकात में ही वो मुझे बहुत मिलनसार लगीं, उन्होंने मुझसे कहा, "बेटा, मैं तेरी माँ की जगह तो नहीं ले सकती, लेकिन पूरी कोशिश करूंगी कि तुम्हे अपना बेटा लूं।" वे समझदार थीं, उस पल मेरी आंखें भावुकतावश नम हो गई। लेकिन पिता जी की आँखों में चमक दौड़ रही थी।

परिवार में सर्कस – रिश्तेदारों का आगमन

शादी की तारीख तय हो गई, 21 मार्च 2026। घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा लग गया। मेरी बुआ जी सबसे पहले आईं, उनके साथ उनके तीन बच्चे। "अरे भाई साहब, आप तो जवान हो गए हो!" बुआ जी ने पिता जी को छेड़ा। पिता जी शरमा गए, और मैं हँस पड़े। 

फिर चाचा जी आए, जो हमेशा मजाक करते हैं। "भतीजे, तेरे पापा तो स्टेप-मदर ला रहे हैं। तू तो अब सावधान रहियो, कहीं तेरी प्रॉपर्टी न छीन लें!" उन्होंने हँसते हुए कहा। मैंने जवाब दिया, "चाचा जी, प्रॉपर्टी तो पापा की ही है, मैं तो बस उनका सहारा हूँ।"

घर में हलचल मच गई। महिलाएँ मेहंदी लगा रही थीं, और पिता जी की हथेली पर मेहंदी से 'एस' लिखा गया, सुनीता वाला एस। "पापा, यह तो स्कूल के दिनों जैसा लग रहा है," मैंने कहा। वे हँसे और बोले "हाँ हाँ... ठीक कह रहे हो बरखुरादर, लेकिन अब क्लासरूम नहीं, ये लाइफ का नया चैप्टर है।"

रिश्तेदारों में मेरी एक कजिन सिस्टर, रिया, वह 25 साल की है, लेकिन सबसे मजेदार। उसने पिता जी के लिए, "दूल्हा बनूँगा मैं" गाने पर एक डांस तैयार किया। रिहर्सल में पिता जी शामिल हुए, लेकिन कदम गड़बड़ा गए। 

"अरे अरे, यह डिस्को नहीं है, आप तो बस सिर्फ "अजगर डांस" करो। बाकी सारे बाराती है ना"। चाचा जी ने कहा। पूरा घर हँसी से गूँज उठा। लेकिन शाम को, जब सब सो गए, मैं पिता जी के पास गया। "पापा, माँ को याद करते हो ?" मैंने पूछा।

"हर दिन" उनकी आँखें नम हो गईं थीं ,उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाते हुए, रुंधे गले से कहा कि, "लेकिन जीवन रुकता नहीं बेटा। सुनीता अच्छी है, वह मेरा तो साथ देगी ही, पूरे परिवार का भी ख्याल रखेंगी।" उस पल हम दोनों रो पड़े, भावनाओं का सैलाब। मैंने सोचा, हाँ, पिता जी को भी अपनी खुशी का हक है।

शादी की तैयारी का तूफान – मजेदार हादसे

शादी की तैयारी में क्या-क्या नहीं हुआ! सबसे पहले कार्ड छपवाए। कार्ड पर लिखा था,'श्रीमान रमेश कुमार जी की दूसरी शादी'। कार्ड प्रिंटर ने गलती से 'दूसरी शादी' लिख दिया। जब कार्ड छप कर घर आए, तब सब हँस पड़े। "पापा, यह तो sequel है, पहली शादी का पार्ट 2!" मैंने कहा। पिता जी ने बात संभालते हुए कहा, "चलो, जो हुआ सो हुआ।"

फिर कैटरिंग का ड्रामा। हमने पंजाबी मेन्यू चुना, पनीर टिक्का, दाल मखनी। लेकिन कैटरर ने गलती से स्पाइसी बना दिया। रिहर्सल डिनर में चाचा जी ने खाया और चिल्लाए, "यह तो आग है!" पानी पीते-पीते सब हँस रहे थे। पिता जी ने चुटकी लेते हुए कहा, "शादी में मसाला जरूरी है!"

हास्य का क्लाइमेक्स तब हुआ, जब हम बारात की रिहर्सल कर रहे थे। पिता जी घोड़ी पर चढ़े, लेकिन घोड़ी ने हिलना शुरू कर दिया। "अरे, यह तो असली घोड़ी है!" मैं चिल्लाया। असल में, हमने किराए की घोड़ी ली थी, पर वह जिद्दी निकली। पिता जी गिरते-गिरते बचे, लेकिन सब तालियाँ बजा रहे थे। "बड़े पापा, आप तो स्टंटमैन हो!" रिया ने कहा।

इत्तेफाक से शादी से पहले एक दिन माँ की डायरी मिली। पिता जी के कमरे में थी। उसमें लिखा था, 'मेरा बेटा बड़ा होकर पिता का सहारा बनेगा।' मैं रो पड़ा। पिता जी ने देखा, तो गले लगा लिया। "बेटा, मैं तेरे लिए जी रहा हूँ, लेकिन अब भावनात्मक रूप से, सुनीता के साथ नई शुरुआत।" मैंने हामी भरी।

यादगार शादी का दिन – हँसी और आँसू

आखिरकार आज का दिन आ गया। सुबह से घर में भगदड़। महिलाएँ साड़ियाँ पहन रही थीं, पुरुष शेरवानियाँ। पिता जी तैयार हो रहे थे, नई शेरवानी, सेहरा। मैंने उन्हें देखा, तो लगा जैसे कोई पुरानी फिल्म का हीरो। "पापा, आप हैंडसम लग रहे हो," मैंने कहा। वे शरमा गए।

एक बात और बड़ी मजेदार हुई कि पिता जी के साथ  घोड़ी पर "सहबाला" किसे बनाया जाए, क्योंकि, इस प्रथा के लिए घर के किसी बच्चे को लेते हैं, किंतु यहां बात फंस गयी, रिया ने जिद्द पकड़ ली और मुझे 40 वर्षीय सहबाला बना कर पिता की के साथ घोड़ी पर बैठा दिया गया।

बारात निकली। पिता जी घोड़ी पर। रास्ते में ट्रैफिक जाम, और बाराती डांस कर रहे थे, 'बदतमीज दिल' पर। एक कार वाला चिल्लाया, "अरे वाह, दादा जी की बारात ?" सब हँस पड़े। मंडप पहुँचे, सुनीता आंटी दुल्हन के रूप में आईं, लाल साड़ी, चूड़ियाँ। वे सुंदर लग रही थीं। फेरे शुरू हुए।

फेरों के दौरान, पंडित जी ने कहा, "अब दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को वचन दें।" पिता जी ने कहा, "मैं तुम्हारा बुढ़ापा संभालूँगा।" आंटी ने कहा, "और मैं तुम्हारा।" सब तालियाँ बजा रहे थे, लेकिन मेरी आँखें नम थीं। मैंने सोचा, माँ कहीं से देख रही होंगी, और खुश होंगी कि पिता जी अकेले नहीं।

विदाई में आंटी रो पड़ीं, उनके बच्चे भी। मैंने उन्हें गले लगाया, "वेलकम टू फैमिली"। वह पल भावुक था। घर लौटे, तो रिसेप्शन। डांस, गाने, मजाक। चाचा जी ने स्पीच दी, जिसमें एक महत्वपूर्ण बात ये थी, "यह शादी इस बात का जीता जागता प्रूफ है कि, प्यार उम्र नहीं देखता!" सब हँसे।

एक नई शुरुआत – मिश्रित हास्य और भावनाएँ

अब शादी के बाद का जीवन मजेदार हो गया। सुनीता मॉम घर में आईं और आते ही उन्होंने किचन संभाला। पहली सुबह, उन्होंने ब्रेकफास्ट में परांठे बनाए। हम सब ने मजे से ब्रेकफास्ट किया। 

लेकिन पिता जी पराठे खाते ही अपने आप को रोक न पाए, "वाह, बिल्कुल वैसा ही जैसे तेरी माँ बनाती थी!" मैंने चुटकी ली, "पापा, अब कॉम्पिटीशन मत करो!" मॉम हँस दीं।

एक दिन, हम तीनों बैठे टीवी देख रहे थे। कोई रोमांटिक फिल्म। पिता जी ने मॉम का हाथ पकड़ा, और मैंने बिना उनकी ओर देखे कहा, "अरे, ये क्या ? मैं यहाँ हूँ!" दोनों पहले शर्माए, फिर हँस पड़े। 

शाम को, मॉम ने मुझसे कहा, "बेटा, एक बात बोलूं, बुरा तो नहीं मानेगा ? तो मैने तुरंत जवाब दिया, " हां, बिल्कुल मानूंगा, क्योंकि कोई मां, ऐसे नहीं पूछती, मां तो हक से बोलती है"। 

"तो आप भी हक से बोलिए"। ये सुनते ही वह पल भर के लिए रुकी, फिर अचानक पूरे आत्म विश्वास के साथ बोली,"तू भी शादी कर ले।" मुझे उनका अधिकार से बोलना बहुत अच्छा लगा। मैंने कहा, "हां मॉम, पहले पापा ने की, अब मेरी बारी।"

भावनात्मक रूप से, मैंने महसूस किया कि परिवार पूरा हो गया। माँ की यादें हैं, लेकिन नई खुशियाँ भी। पिता जी अब हँसते ज्यादा हैं, और हम सब,एक दूसरे का सहारा...

यह कहानी हास्य से भरी है, लेकिन भावनाओं का तड़का इसे खास बनाता है। जीवन ऐसे ही है, हँसी और आँसू का मेल।

लेखक मनोज भट्ट कानपुर ...     22 मार्च 2026

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 - मनोज भट्ट, कानपुर  

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