"पीढ़ियों के लिए सोच से स्वार्थ तक की यात्रा" "Journey from Generational Thinking to Self‑Interest"


"एक बुज़ुर्ग व्यक्ति पौधा लगा रहे हैं, पास में बच्चे संतरे खाते हुए मुस्कुरा रहे हैं, हरियाली और प्रकृति का दृश्य   "An elderly man planting a sapling while children enjoy oranges under a fruit tree in a green natural setting."


दीर्घकालिक सोच बनाम तात्कालिक स्वार्थ

        एक वक़्त था जब हमारे पूर्वज फलदार वृक्ष इस सोच के साथ लगाते थे कि आने वाली पीढ़ियाँ उनका फल खाएँगी। यह केवल एक प्राकृतिक कार्य नहीं था, बल्कि एक विचारधारा थी, समर्पण, परमार्थ और दीर्घकालिक सोच थी। लेकिन आज हम उस मोड़ पर आ पहुँचे हैं जहाँ यह सोच धुंधली होती जा रही है।

वर्तमान परिदृश्य में, "अभी और मेरे लिए"

      आज का व्यक्ति, शीघ्र लाभ की तलाश में है। सरल शब्दों में कहा जाए तो वह उसी वृक्ष को लगाना चाहता है, जिसका फल वह स्वयं खा सके। अपने नाती पोतों की तो बात ही छोड़िए, अपने बच्चों के लिए भी नहीं सोचता। उसका ध्यान स्वयं तक सीमित हो गया है, न ही आने वाली पीढ़ियाँ उसकी दृष्टि में हैं और न ही उनके हित।

      बच्चों के भविष्य की चिंता गौण होती जा रही है।
समाज में व्यक्तिगत सुख-सुविधा ही प्राथमिकता बन चुकी है और साझा जिम्मेदारियों का स्थान व्यक्तिगत स्वार्थ ले रहा है।

       समाज में इसके त्वरित दुष्परिणाम, विभिन्न रूप में देखने को मिल रहे हैं। आपसी संबंधों में दूरी बढ़ रही है, पारिवारिक जुड़ाव कमजोर हो रहा है। साथ ही वर्तमान पीढ़ियाँ भावनात्मक रूप से अलग-थलग पड़ रही हैं।

       जब व्यक्ति केवल अपने लिए सोचता है, तो समरसता और सहयोग का "समाजिक्र ताना-बाना" टूटने लगता है और स्वार्थ की यही प्रवृत्ति समाज में कई स्तरों पर विकृति उत्पन्न करती है।

      तो आइये हम सब मिल कर अपनी विरासत को पुनर्जीवित का प्रयास करें। हमें अब उस सोच की ओर लौटना होगा जो "हम" से शुरू होकर "आने वाली पीढ़ी" पर जाकर पूरी होती है। लेकिन कैसे...?

समाधान की दिशा के कदम...
  • शिक्षा में मूल्य आधारित पाठ्यक्रम जोड़ें जो परमार्थ, त्याग और सामाजिक उत्तरदायित्व को समझाएँ।
  • परिवार में पीढ़ियों का संवाद बढ़ाएँ ताकि भावनात्मक जुड़ाव सशक्त हो।
  • "एक वृक्ष अगली पीढ़ी के लिए" जैसे अभियान चलाकर लोगों को इसके पीछे के मतलब को समझा कर, दीर्घकालिक सोच के लिए प्रेरित करें।
"जागरूकता ही क्रांति है"

     सबसे महत्वपूर्ण बात, यूं तो सरकारों द्वारा प्रति वर्ष वृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम, जो कि अत्यंत सराहनीय है, उसी कार्यक्रम को आगे बढ़ते हुए, उसमें एक मूल भावना को भी प्रचारित करना चाहिए कि "ऐसे पौधे लगाएं जिनके फल हमारे नाती पोतों को मिले"।

      और साथ ही इसके अंदर छिपी मूल भावना को भी बच्चों में एक अभियान चला कर समझाएं, ताकि नई पीढ़ी में अपनी आगामी पीढ़ी और समाजिक हित के प्रति दूरगामी सोच की भावना का सूत्रपात हो...

       यह लेख एक आह्वान है, स्वार्थ की संकीर्ण दीवारों को तोड़कर भविष्य की छाया देने वाले विचारों को रोपित करने का। हमें "अभी" नहीं बल्कि अपनी अपनी आगामी पीढ़ी हेतु "आगे" के लिए जीना सीखना होगा, क्योंकि यही सोच समाज को एकजुट कर सकती है...

लेखक: मनोज भट्ट
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