माता-पिता का सम्मान क्यों जरूरी है? | बुजुर्गों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारी

साथ चलती उम्र की कहानी

बुजुर्ग माता-पिता पार्क में बैठे हुए – सम्मान और अपनापन की तलाश में

आज के समय में बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान और उनकी देखभाल केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और मानवीय मूल्यों का आधार है। यह लेख परिवार, समाज और रिश्तों की सच्चाई को उजागर करता है।

यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय बन गया है, माता-पिता वो दीवार है जो कभी नहीं गिरती, लेकिन जिसे हम भूल जाते हैं। ध्यान रखे कि जब कोई शिशु अपनी माँ की गोद में पहली बार आँखें खोलता है, तो दुनिया का सबसे पहला स्पर्श उसकी माँ की उँगलियों का होता है। वो नरम, गर्म, और बिना किसी शर्त का स्पर्श। 

पिता, अपना हाथ उसकी पीठ पर रखकर उसे सहारा देता है वो सहारा जो जीवन भर चलता है। माँ-पिता उन दीवारों की तरह होते हैं जो तूफान में भी बच्चों को ढककर रखते हैं। कोई शोर और कोई आँधी उन्हें कभी हिला नहीं पाती। लेकिन... समय नाम का वो चोर, धीरे-धीरे सब बदल देता है।

बचपन की यादें कितनी मीठी होती हैं, और कितनी कड़वी भी। रात के दो बजे माँ जाग रही है। बच्चे को बुखार चढ़ा हुआ है। माथे पर ठंडी पट्टी रखती हुई वो खुद थक चुकी है, लेकिन उसकी आँखों में नींद नहीं। “बेटा, पानी पी ले... दवा खा ले...” आवाज़ में ममता भरी हुई है। 

बाहर बारिश हो रही है, कमरे में लालटेन जल रही है, बिजली चली गई है। पिता ऑफिस से लौटकर थका-हारा आया है। उसकी कमीज में पसीने की गंध अभी भी बाकी है। लेकिन वो बिना रुके बच्चे के पास बैठ जाता है। “क्या हुआ रे ? डॉक्टर बुलाऊँ ?” फिर सुबह होते ही वो फिर ऑफिस भाग जाता है। फीस जमा करानी है, किताबें खरीदनी हैं, बच्चे का सपना पूरा करना है।

ये तस्वीरें हर भारतीय घर में बसी हुई हैं। माँ की चूड़ियों की खनक, पिता के थके कदमों की आहट, ये सब हमारे बचपन की लोरी थीं। हमने देखा था कि माँ अपने खाने से पहले बच्चों को खिला देती थी। 

पिता त्योहारों पर नया कपड़ा तो खरीदते थे, लेकिन खुद पुरानी कमीज़ पहनकर रह जाते थे। “बेटा, तू पढ़ ले... हम तो बस तेरे लिए जी रहे हैं।” ये वाक्य कितनी बार सुने हमने? लेकिन तब हमें समझ नहीं आता था कि ये वाक्य कितने बड़े त्याग की कहानी कह रहे थे।

फिर समय ने पंख फैलाए। बच्चे स्कूल से कॉलेज गए, कॉलेज से नौकरी में। बेटा बड़े शहर चला गया। बेटी की शादी हो गई। घर में अब सन्नाटा है। माँ-पिता अब बूढ़े हो चुके हैं। उनकी कमर झुक गई है, आँखों में धुंध है, घुटनों में दर्द है। 

लेकिन उनकी आँखों में अब भी वही चमक है, बच्चों की यादों की चमक। वे अकेले बैठे पुरानी तस्वीरें देखते हैं। कभी-कभी फोन आता है,“माँ, कैसी हो ?” लेकिन वो फोन कॉल में भी जल्दी में रहता है। “मम्मी, मीटिंग है... बाद में बात करते हैं।”

फिर एक दिन बेटा या बेटी कहता है,“माँ-पापा, अब आपके आराम का समय है। हमारे पास आ जाइए। हम सब साथ रहेंगे।” माँ-पिता की आँखें नम हो जाती हैं। दिल में उम्मीद जागती है। “अब हमारा बुढ़ापा सुरक्षित है। बच्चे हमें अपने साथ रखेंगे।” वे सामान बांधते हैं, वो पुरानी एल्बम, माँ की साड़ियाँ, पिता की लाठी, और वो छोटी-सी मूर्ति, जो घर की पूजा-घर में रखी थी। ट्रेन या बस से वे बच्चों के शहर पहुँचते हैं।

लेकिन उनके पास पहुंच कर, कुछ ही समय के बाद सच्चाई सामने आती है। “पापा, बाहर मत जाना... ट्रैफिक है।” “माँ, बच्चों को कुछ मत कहना... वे छोटे हैं।” “आपकी ये पुरानी आदतें... अब बदल जाइए।” “मोबाइल पर इतना मत देखिए... आँखें खराब हो जाएंगी।” “हमारी मीटिंग है... आप आराम करिए।” धीरे-धीरे वो दीवार जो कभी बच्चों को बचाती थी, अब खुद बंधन में कैद हो जाती है।

क्या ये सेवा है ? या सिर्फ़ एक मजबूरी ?

जहां सम्मान न हो, वहां सेवा सुंदर हो ही नहीं सकती। सम्मान वो नहीं जो सिर्फ़ शब्दों में हो। सम्मान वो है जो दिल से निकले। जब माँ कहती है, “बेटा, मैं थोड़ा बाहर घूम आऊँ ?” और बेटी कहे, “मम्मी, अब आप कहाँ जाओगी ? घर में ही रहो ना...” तो वो एक छोटा-सा वाक्य माँ के दिल को चीर देता है। पिता जब कहते हैं, “मेरी पुरानी दोस्ती की बैठक है...” और बेटा जवाब दे, “पापा, अब आपकी उम्र हो गई है... क्या जरूरत है ?” तो पिता का दिल टूट जाता है।

हम भूल जाते हैं कि बचपन में हमने कितनी Tshirts की थीं। परीक्षा में फेल हो गए, तो माँ गले लगकर रोई था। पिता ने बिना डाँटे कहा था,“कोई बात नहीं... अगली बार और मेहनत करेंगे।” 

हमने जब कभी झूठ बोला, तो उन्होंने बिना शर्त माफ कर दिया। हमने उनकी बात नहीं मानी, तो उन्होंने चुपचाप हमारा साथ दिया। उनका प्यार कभी शर्तों पर नहीं टिका था। वो बिना शर्त था। बिना पूछे। बिना हिसाब लगाए।

आज हम उन्हें अपना “कर्तव्य” समझकर सेवा करते हैं। दवा देते हैं, खाना खिलाते हैं, बिस्तर लगाते हैं। सब कुछ करते हैं, लेकिन उनकी बात नहीं सुनते, कभी उनकी इच्छा नहीं पूछते। उनकी यादों को महत्व नहीं देते। क्या ये प्रेम है या सिर्फ़ एक सामाजिक दिखावा ?

सच्चा अपनापन वो है जब बेटा शाम को ऑफिस से लौटकर माँ के पास बैठे और कहे, “माँ, आज तुम्हारा दिन कैसा रहा ? वो पुरानी कहानी फिर सुना दो ना...” और माँ की आँखें चमक उठें। 

जब बेटी रात को पिता के पास बैठकर कहे, “पापा, तुम्हारी वो नौकरी की कहानी... फिर बताओ ना... मैं सुनना चाहती हूँ।” तब पिता को लगेगा कि वो अब भी उपयोगी हैं। उनकी कहानियाँ अब भी मायने रखती हैं।

सम्मान का मतलब है उन्हें निर्णय लेने का अधिकार देना। “माँ, तुम्हें क्या खाना है आज ?” पूछना। “पापा, तुम्हें कहाँ घूमना है ?” पूछना। उनकी पुरानी आदतों पर हँसना नहीं, बल्कि उन्हें सहेजना। उनकी कमजोरियों पर तरस नहीं खाना, बल्कि उनकी ताकत को याद करना।

भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवता माना गया है। “माता पिता गुरु देवः”। लेकिन आज हम उन्हें सिर्फ़ बोझ समझने लगे हैं। शहरों में न्यूक्लियर फैमिली बढ़ गई है। बूढ़े माता-पिता को ओल्ड एज होम भेज दिया जाता है। लेकिन क्या वो होम उनकी पीड़ा कम कर पाता है ? नहीं। क्योंकि वहाँ सेवा तो मिलती है, लेकिन अपनी सा अपनापन नहीं। सम्मान नहीं।

एक कहानी याद आती है। एक बूढ़ी माँ अपने बेटे के घर आई थीं। बेटा अमीर था। बड़ा बंगला, नौकर-चाकर। लेकिन माँ को एक छोटे-से कमरे में रख दिया गया। “माँ, तुम्हें परेशानी नहीं होगी।” माँ चुपचाप रहतीं। एक दिन पोता आया और बोला, “दादी, तुम्हारी ये पुरानी साड़ी... फेंक दो ना।” माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, ये साड़ी मैंने तेरे पिता की पहली नौकरी पर पहनी थी।” लेकिन कोई नहीं सुना।

फिर एक शाम बेटा घर लौटा। माँ ने चुपचाप उसकी प्लेट में खाना परोसा। बेटे ने कहा, “माँ, आजकल तुम बहुत चुप रहती हो।” माँ ने आँखों में आँसू भरकर कहा, “बेटा, जब तुम छोटे थे, तो मैं रात-रात भर तुम्हारे बुखार में जागती थी।"

" हम लोगों को आए इतने दिन हो गए, लेकिन तुमने कभी नहीं पूछा कि हम लोग ठीक हैं या नहीं। आज मैं तुमसे पूछ रही हूँ... क्या तुम ठीक हो ?” बेटे को अपनी भूल का एहसास हुआ, उसका दिल पिघल गया। उस रात उसने माँ को अपने कमरे में बुलाया। “माँ, अब तुम मेरे पास सोओगी।”

ये छोटी-छोटी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि माता पिता के प्रति सम्मान एक शब्द नहीं, एक भाव है। माँ-पिता को समय चाहिए। सिर्फ़ पैसे नहीं। सिर्फ़ दवा नहीं। उनकी कहानियाँ सुनने का समय चाहिए।

उनकी यादों में साथ चलने का समय। जब वे कहें, “बेटा, याद है वो दिन जब तुम स्कूल से रोते हुए आए थे?” तो हम मुस्कुराकर कहें, “हाँ माँ, और तुमने मुझे चॉकलेट खिलाई थी।” ये छोटे-छोटे पल उन्हें जीने की वजह देते हैं।

माता पिता का प्यार बिना शर्त वापस लौटाना चाहिए। हम उन्हें बचपन में जो कुछ नहीं दे पाए, वो अब दे सकते हैं। उनका हाथ थामकर टहलना। उनकी आँखों में झाँककर कहना, “आप हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा आशीर्वाद हो।”

आजकल हम कहते हैं, “हम बहुत व्यस्त हैं।” लेकिन क्या हम सच में इतने व्यस्त हैं कि माँ-पिता के लिए दस मिनट भी नहीं निकाल सकते ? क्या हम भूल गए कि एक दिन हम भी बूढ़े होंगे और तब हमारे बच्चे भी यही कहेंगे,“पापा, अब आपकी बातें पुरानी हो गईं।”

सम्मान देना सीखें। सेवा के साथ अपनापन दें। उन्हें महसूस कराएँ कि वे बोझ नहीं, बल्कि हमारे जीवन का आधार हैं। जब तक हम उन्हें “कर्तव्य” समझकर निभाएंगे, प्रेम अधूरा रहेगा। सच्चा प्रेम तब शुरू होता है जब हम उन्हें अपनी दुनिया का केंद्र बनाते हैं। उनकी खुशी में अपनी खुशी ढूँढते हैं।

हम सबको हमेशा याद रखना चाहिए कि माँ की गोद, अब भी सबसे सुरक्षित जगह है और पिता का कंधा, अब भी दुनिया का सबसे मजबूत सहारा है। हमें याद रखना है, वे अब भी वही माँ-पिता हैं, जो कभी हमारे लिए सब कुछ थे।

आइए, आज से ही शुरू करें। फोन उठाएँ। कहें, “माँ, मैं आ रहा हूँ। तुम्हारे पास बैठकर बात करनी है।” “पापा, चलो बाहर घूम आएँ।” ये छोटे-छोटे कदम ही सच्ची सेवा हैं। सम्मान के साथ। अपनापन के साथ।

क्योंकि माता-पिता की सेवा से ज़्यादा जरूरी है उन्हें अपनापन और सम्मान देना।

लेखक -- मनोज भट्ट, कानपुर 

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