वृद्धावस्था की नई परिभाषा: संपत्ति नहीं, संस्कार और संबंध हैं सहारा | Redefining Old Age: Not Wealth, but Values & Relationships are the Real Support

उदास बैठे वृद्ध माता-पिता, पीछे खिड़की से दूर जाते हुए एक युवा दंपत्ति की परछाईं — परिवार और वृद्धावस्था के बदलते रिश्तों को दर्शाता भावनात्मक दृश्य। Sad elderly parents sitting indoors while the silhouette of a young couple walking away is seen through a window, an emotional scene depicting changing family relationships and old-age loneliness.
यह है मेरी रचना का दृश्य 
                वृद्धावस्था की नई परिभाषा...
      संपत्ति नहीं, संस्कार और संबंध हैं सच्चा सहारा

  तेजी से बदलते समय, सामाजिक संरचनाओं और पारिवारिक व्यवस्थाओं ने वृद्धावस्था की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। एक समय था जब माना जाता था कि जितनी अधिक संचित संपत्ति होगी, उतना ही बुढ़ापा सुरक्षित होगा। 
 
     माता-पिता के लिए संतानें सबसे बड़ी ढाल और सहारा थीं, क्योंकि भावनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ संपत्ति की सुरक्षा और हिस्सेदारी की भावना उन्हें माता-पिता की देखभाल के लिए प्रेरित करती थी।

     लेकिन बदलते दौर ने इस सोच की सीमाओं को धराशाई कर दिया है। आज स्पष्ट है कि संपत्ति कभी भी रिश्तों को स्थायी रूप से जोड़कर नहीं रख सकती। वास्तविक सहारा धन नहीं, बल्कि संस्कार, संवाद, संबंध और आपसी सम्मान हैं।

बदलती सामाजिक तस्वीर

     भारत की पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली ने सदियों तक बुजुर्गों को सहारा दिया। दादा-दादी, पोते-पोतियों के साथ रहते थे, घर में निर्णय का अधिकार उनके पास होता था और संपत्ति की साझेदारी सबको जोड़कर रखती थी।

     शहरीकरण, शिक्षा और रोजगार के बदलते अवसरों ने परिवार की संरचना को बदल दिया। चिंता की बात है कि 60% से अधिक बुजुर्ग अपने बच्चों के साथ नहीं रहते।

     जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लगभग 8% जनसंख्या 60 वर्ष से ऊपर थी, जो अनुमान के अनुसार आज (2025) बढ़कर 12% से अधिक हो चुकी है। जो कि 2050 तक भारत में हर पाँचवाँ व्यक्ति बुजुर्ग होगा।

      इस परिवर्तन का एक बड़ा कारण आर्थिक स्वतंत्रता और प्रवासी जीवनशैली है। नौकरी, व्यापार या शिक्षा के लिए बच्चे अलग शहरों और देशों में बस जाते हैं। ऐसे में  बच्चों के लिए बुजुर्गों की देखभाल करना केवल संपत्ति पर आधारित संबंधों से संभव नहीं रह जाती।

संपत्ति की सीमाएँ

     अक्सर यह सोचा जाता है कि यदि माता-पिता बच्चों को पर्याप्त संपत्ति छोड़ेंगे तो वे सेवा करेंगे। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है।
  • संपत्ति विवादों का कारण बनती है -- अखबारों और अदालतों के आँकड़े बताते हैं कि भारत में सबसे अधिक पारिवारिक मुकदमे संपत्ति के बँटवारे से जुड़े होते हैं। कई बार भाई-बहन आपस में ही संबंध तोड़ लेते हैं।
  • भावनात्मक जुड़ाव का स्थान नहीं ले सकती -- धन या मकान माता-पिता के प्रति सम्मान या प्रेम पैदा नहीं कर सकते।
  • क्षणिक सहारा देती है -- संपत्ति खत्म होने पर संबंधों का आधार भी कमजोर पड़ जाता है।
      उदाहरण के लिए दिल्ली के एक परिवार के एक बुजुर्ग दंपत्ति ने अपनी करोड़ों की संपत्ति बेटों को सौंप दी, यह सोचकर कि वे उनकी सेवा करेंगे। लेकिन संपत्ति ट्रांसफर होते ही उन्हें घर से बाहर कर दिया गया। बाद में अदालत में मामला पहुँचा और “वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007” के तहत उन्हें कुछ हद तक न्याय मिला। लेकिन मानसिक पीड़ा और अकेलेपन की भरपाई कभी नहीं हो सकी।

संस्कार और संबंध

    आईए अब समझते हैं कि वर्तमान समय में संस्कार और संबंध, निम्न बिंदुओं के आधार ही पर सबसे बड़ा निवेश साबित होते हैं।
  • बुजुर्गों के लिए वास्तविक सुरक्षा वही है, जो जीवनभर दिए गए संस्कारों से उपजती है।
  • यदि माता-पिता ने बच्चों को संवाद, आदर और परिवार के महत्व का पाठ पढ़ाया है, तो बड़े होने पर वे स्वयं जिम्मेदारी निभाते हैं।
  • संस्कार बच्चों को यह सिखाते हैं कि बुजुर्ग बोझ नहीं, बल्कि आशीर्वाद हैं।
  • जिस परिवार में संवेदनशीलता और साझा जिम्मेदारी का भाव होता है, वहाँ संबंध टिकते हैं, चाहे दूरी भौगोलिक ही क्यों न हो।
     उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु की एक आईटी प्रोफेशनल बेटी ने अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेजने के बजाय “वर्क फ्रॉम होम” चुन लिया, ताकि वे साथ रह सकें। उसने कहा, “माता-पिता ने हमें जीवनभर सहारा दिया, अब यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी है कि मैं उनके साथ रहूँ।”

वर्तमान दौर के माता पिता के लिए सुझाव 

    बदलते सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए आज के माता पिता को भी कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर चलना ही होगा जैसे कि, 
  • बच्चों को बचपन से ही नैतिकता का वातावरण दें।
  • परिवार में आपसी संवाद बढ़ाएँ।
  • बच्चों को बचपन से ही बड़ों का सम्मान करना सिखाएँ। 
     साथ ही उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि बच्चों को उच्च शिक्षा या उच्च रोजगार के लिए संभावित भविष्य में उनसे दूर जाना होगा। ऐसे में उन्हें अपनी संचित संपत्ति का गुमान ना करते हुए अपने भविष्य की भावनात्मक जरूरत की तैयारी भी शुरू कर देनी चाहिए।
     
    क्योंकि बुढ़ापे की योजना केवल धन पर नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और शौकों पर भी  निर्भर करती है। इस लिए सामुदायिक सहयोग हेतु मोहल्लों, क्लबों और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं आदि में सक्रिय होना होगा।

"वृद्धावस्था की तैयारी केवल आर्थिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रह सकती।"

    आज की हकीकत यही है कि संपत्ति कभी रिश्तों को टिकाऊ नहीं बना सकती। यदि माता-पिता बच्चों से केवल धन या संपत्ति के सहारे जुड़े हैं, तो संबंध कमजोर रहेंगे। लेकिन यदि परिवार में संस्कार, प्रेम, संवाद और आपसी सम्मान है, तो संतानें किसी भी परिस्थिति में साथ खड़ी रहेंगी।

     "संपत्ति जीवन को नहीं जोड़ती, लेकिन प्रेम और संस्कार जीवनभर साथ निभाते हैं। यही वृद्धावस्था की सच्ची ढाल है..."
 
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