सास-बहू संबंध और बेटियों की परवरिश : रिश्तों की जड़ों में छिपा सामाजिक सच 🔹 Mother-in-Law and Daughter-in-Law Relationship: The Role of Daughters’ Upbringing in Indian Society
सास-बहू संबंध और बेटियों की परवरिश : रिश्तों की जड़ों में छिपा सामाजिक सच
क्या कभी आपने सोचा है जो बच्चियां, जो बेटियां अपने घर में, शादी से पूर्व तमाम खूबियों से परिपूर्ण, घर की रौनक, घर में खुशहाल माहौल बनाने वाली और सब की प्यारी दुलारी होती हैं, वही जब शादी के बाद अपने ससुराल में जाती हैं तो अचानक वहां से उनकी तमाम कमियां बताई जाने लगती हैं।
उसी बेटी की तमाम बुराइयां बताई जाने लगती हैं, खासकर सास के साथ सामंजस्य न बैठाने वाली या यूं कहें कि संघर्ष की बातें सामने आने लगती है और फिर धीरे धीरे सही और गलत के संघर्ष में दोनों परिवार उलझ कर रह जाते हैं।
तो ऐसा क्यों होता है कि अचानक अच्छी खासी बेटियां, बदनाम बहू बन जाती हैं। तो चलिए एक नए नजरिए से इस विषय पर विचार करें कि आखिर ऐसा क्यों होता है। इस बहुचर्चित विषय पर अपने विचार आपके सामने रखने की कोशिश है। हो सकता है इसमें कुछ सुधार की संभावना हो तो अपनी टिप्पणी अवश्य भेजें।
भारतीय समाज में परिवारिक संबंधों की जटिलता और गहराई, सदियों से चर्चा का विषय रही है। विशेषकर सास-बहू का रिश्ता, जो अक्सर सामाजिक विमर्श और साहित्यिक रचनाओं में केंद्र बिंदु बनता रहा है। यह रिश्ता केवल दो व्यक्तियों का नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार और समाज की संरचना को प्रभावित करता है।
अनुभवों से स्पष्ट होता है कि इस रिश्ते की जड़ें बचपन की परवरिश में गहराई से जुड़ी होती हैं। मां अपनी बेटियों को जिस प्रकार से पालती है, वही आगे चलकर उनके वैवाहिक जीवन और ससुराल के संबंधों को आकार देता है।
रिश्तों की कहानी, समाज की तस्वीर
भारतीय समाज में परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और भावनात्मक जुड़ाव का केंद्र रहा है। परिवार के भीतर बनने-बिगड़ने वाले रिश्ते समाज की दिशा तय करते हैं। इन्हीं रिश्तों में सबसे अधिक चर्चित, सबसे अधिक विवादित और सबसे अधिक संवेदनशील रिश्ता रहा है, सास और बहू का रिश्ता।
यह रिश्ता अक्सर संघर्ष, तनाव और असहमति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी और जटिल है। प्रश्न यह नहीं है कि सास-बहू का रिश्ता कठिन क्यों होता है, बल्कि यह है कि हम इसे कठिन क्यों बना देते हैं।
यदि ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए, तो इस रिश्ते की नींव विवाह के बाद नहीं, बल्कि बचपन की परवरिश में रखी जाती है। एक बेटी को जिस सोच, संस्कार और अनुशासन के साथ पाला जाता है, वही आगे चलकर उसके वैवाहिक और पारिवारिक जीवन को दिशा देता है।
भारतीय परिवारिक संरचना और सास-बहू संबंध
भारतीय परिवार परंपरागत रूप से संयुक्त परिवार की अवधारणा पर आधारित रहा है। इस व्यवस्था में सास परिवार की वरिष्ठ स्तंभ होती है और बहू नई कड़ी के रूप में जुड़ती है। यह रिश्ता केवल दो स्त्रियों का नहीं होता, बल्कि यह पूरे परिवार के संतुलन से जुड़ा होता है।
सास के लिए बहू...घर की परंपराओं की उत्तराधिकारी होती है, बेटे के जीवन की संगिनी होती है और परिवार के भविष्य की निर्माता होती है।
वहीं बहू के लिए सास...मार्गदर्शक हो सकती है, अनुभव का स्रोत हो सकती है और भावनात्मक सहारा भी।
परंतु जब अपेक्षाएं स्पष्ट नहीं होतीं और संवाद समाप्त हो जाता है, तो यही रिश्ता टकराव में बदल जाता है।
बेटियों की परवरिश : व्यक्तित्व निर्माण की जड़
बचपन में बोया गया बीज, बेटी की परवरिश केवल उसे सुरक्षित और खुश रखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बचपन में सिखाए गए मूल्य ही भविष्य में उसके व्यवहार का आधार बनते हैं।
यदि बेटी को केवल यह सिखाया जाए कि, वह हमेशा सही है, उसकी हर इच्छा पूरी होनी चाहिए, उसे किसी के लिए झुकने की आवश्यकता नहीं, तो वह जीवन की वास्तविकताओं के लिए तैयार नहीं हो पाती।
लाड़-प्यार और अनुशासन : संतुलन की आवश्यकता
अत्यधिक लाड़-प्यार का सामाजिक प्रभाव...
आज कल लगभग सभी परिवारों में बेटियों को भावनात्मक रूप से इतना सुरक्षित रखा जाता है कि उन्हें जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझने का अवसर ही नहीं मिलता। जिसके परिणामस्वरूप उनमें सहनशीलता कम हो जाती है, किसी भी असहमति को अपना अपमान समझने लगती है और उनके अपने रिश्तों में लचीलापन समाप्त हो जाता है
अनुशासन का सकारात्मक योगदान...
जबकि जिन बेटियों की बचपन से प्यार के साथ साथ, अनुशासन में परिवरिश होती है, उनके स्वभाव में सकारात्मकता और दूसरों के प्रति सहयोग करने वाला गुण उत्पन्न होता है।
अनुशासन बेटी को कठोर नहीं बनाता, बल्कि, आत्मसंयमी बनाता है, जिम्मेदार बनाता है और सामाजिक बनाता है।
अनुशासन के साथ दिया गया प्यार बेटी को संतुलित व्यक्तित्व प्रदान करता है, जो ससुराल में सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होता है।
सास-बहू संबंधों से जुड़ी सामाजिक धारणाएं
समाज में यह धारणा गहराई से बैठ चुकी है कि सास और बहू का रिश्ता स्वभाव से ही संघर्षपूर्ण होता है। यह सोच रिश्तों को पहले ही विषाक्त बना देती है। जबकि सच्चाई यह है कि रिश्ते स्वभाव से नहीं, व्यवहार से बिगड़ते हैं।
परवरिश का सीधा प्रभाव ससुराल के रिश्तों पर...जिन बेटियों को बचपन से रिश्तों की अहमियत, बड़ों के अनुभव का सम्मान करना और सामूहिक निर्णय की समझ सिखाई जाती है, वे ससुराल में भी संतुलन बना पाती हैं।
शिक्षा के साथ संस्कार क्यों आवश्यक हैं
शिक्षा आत्मनिर्भरता देती है, पर संस्कार संबंध निभाने की कला सिखाते हैं। ध्यान रहे केवल शिक्षित बेटी समाज को जोड़ नहीं सकती, शिक्षा के साथ ही संस्कारयुक्त बेटी ही समाज को संभाल सकती है।
मांओं की भूमिका : भविष्य का निर्माण
मां बेटी की पहली गुरु होती है...वही उसे सिखाती है कि, कब बोलना है, कब चुप रहना है और कब समझौता
करना है। साथ में यह भी बताती है कि कभी कभी विपरीत परिस्थितियों में समझौता करना एक शक्ति है, कमजोरी नहीं।
समाधान : संघर्ष से सहयोग की ओर
इस विषय पर गहन चिंतन करने के पश्चात, समाधान की दिशा में यह निष्कर्ष निकलता है कि सास-बहू संबंधों को मजबूत बनाने के लिए निम्न उपाय का अपना कर स्थितियों को प्रिय बनाया जा सकता है... जैसे आपसी संवाद कों पुनर्जीवित करना, एक दूसरे से अपेक्षाओं को स्पष्ट करना। निश्चय ही इससे सामाजिक सोच में परिवर्तन भी परिलक्षित होगा।
रिश्ते परवरिश की परछाईं होते हैं
सास-बहू संबंध कोई समस्या नहीं, बल्कि समाज की परवरिश का परिणाम है। यदि बेटियों को बचपन से प्यार, अनुशासन, संस्कार और जिम्मेदारी का संतुलन सिखाया जाए, तो ससुराल उनके लिए पराया नहीं रहेगा। क्योंकि रिश्ते शब्दों से नहीं, संस्कारों से निभते हैं।
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मनोज भट्ट, कानपुर 31 दिसंबर 2025
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