सामाजिक शिष्टाचार का लुप्त होता स्वरूप : आधुनिक जीवनशैली में विनम्रता और आदर की पुनर्स्थापना The Vanishing Face of Social Etiquette: Restoring Courtesy and Respect in Modern Lifestyle
सामाजिक शिष्टाचार का लुप्त होता स्वरूप
आधुनिक जीवनशैली में विनम्रता और आदर की पुनर्स्थापना की आवश्यकता...
लेखक: मनोज भट्ट, कानपुर, प्रकाशन तिथि: १८ मई २०२५
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यह लेख पूर्व में अपने फेसबुक पेज पर प्रकाशित किया था, जिसे आज थोड़ा विस्तार देते हुए पुनः अपने हिंदी ब्लॉग "सामाजिक ताना-बाना" में प्रकाशित किया जा रहा है।
बदलते समय की एक चिंताजनक तस्वीर
आज तक के सामाजिक ताना-बाना की धड़कन, उसके मूल तत्वों, संस्कारों और शिष्टाचार में बसती है। जब हम वर्तमान समय की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि तकनीकी प्रगति और आधुनिक जीवनशैली ने हमें सुविधाएँ तो दी हैं, लेकिन कहीं न कहीं हमारे व्यवहार और आपसी संबंधों की गरिमा को क्षीण कर दिया है।
पहले जहाँ बुजुर्गों के चरण स्पर्श करना, पड़ोसियों से आत्मीयता से मिलना, और सार्वजनिक स्थानों पर संयमित भाषा का प्रयोग करना सामान्य था। किंतु आज यह सब धीरे-धीरे औपचारिकता या "पुराने जमाने की बातें" बनते जा रहे हैं।
यह लेख केवल समस्या का वर्णन नहीं करता, बल्कि संक्षेप में इसके कारणों, परिणामों और समाधान की दिशा में एक गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
सामाजिक शिष्टाचार...
"सामाजिक शिष्टाचार" वह अदृश्य धागा है, जो समाज को जोड़कर रखता है। यह केवल नियमों का ही पालन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का सम्मान भी करता है। इसमें मुख्यतः निम्नलिखित गुण विद्यमान रहते हैं...
- विनम्रता (दूसरों की भावनाओं को महत्व देना)
- आदर (वरिष्ठों, गुरुजनों, महिलाओं और बच्चों के प्रति सम्मान)
- मर्यादा (सार्वजनिक स्थानों पर संयमित आचरण)
- संवेदनशीलता (दूसरों की परिस्थितियों को समझने की क्षमता)
इन उपरोक्त मूल्यों के बिना समाज केवल भीड़ बन जाता है, जिसमें आत्मीयता और सुरक्षा का भाव खो जाता है।
आधुनिकता और डिजिटल युग का प्रभाव...
1. डिजिटल संचार का वर्चस्व
- संवाद अब आमने-सामने नहीं, बल्कि स्क्रीन पर इमोजी और शॉर्टकट्स तक सीमित हो गया है।
- "Seen" और "Ignore" जैसे व्यवहार ने संवेदनशीलता को कमजोर किया है।
- गहराई वाले संवाद की जगह सतही प्रतिक्रियाएँ हावी हो गई हैं।
2. आत्मकेंद्रित सोच
- "मैं" और "मेरा" की भावना ने "हम" और "हमारा" को पीछे छोड़ दिया।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह ने सामाजिक उत्तरदायित्व को गौण बना दिया।
3. व्यस्त जीवनशैली
- समय की कमी ने औपचारिकताओं को बोझ बना दिया।
- बुजुर्गों से संवाद, पड़ोसियों से मेलजोल और सामाजिक आयोजनों में भागीदारी घट रही है।
सामाजिक शिष्टाचार के लुप्त होने के परिणाम
1. आपसी संबंधों में दूरी
- संवाद की कमी से रिश्तों में ठंडापन आ गया है।
- सम्मान की जगह औपचारिकता ने ले ली है।
2. बुजुर्गों और गुरुजनों की उपेक्षा
- अनुभव और मार्गदर्शन को महत्व नहीं दिया जाता।
- "Old-fashioned" कहकर उनकी बातों को नजरअंदाज किया जाता है।
- सार्वजनिक स्थानों पर अभद्र भाषा और व्यवहार बढ़ा है।
- बच्चों को संस्कार देने की प्रक्रिया कमजोर हुई है।
4. सामाजिक संरचना पर नकारात्मक प्रभाव
- सामूहिकता की भावना क्षीण हो रही है।
- समाज में असहिष्णुता, असंवेदनशीलता और अकेलेपन की भावना बढ़ रही है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
- भारतीय संस्कृति में शिष्टाचार का महत्व सदियों से रहा है।
- वेदों और उपनिषदों में "आचार" को धर्म से भी ऊँचा स्थान दिया गया है।
- गुरुकुल परंपरा में गुरुजनों के प्रति आदर और अनुशासन सर्वोपरि था।
- लोकगीतों और कहावतों में भी शिष्टाचार को सामाजिक जीवन का आधार माना गया।
आज जब हम इन परंपराओं से दूर जा रहे हैं, तो यह केवल सांस्कृतिक हानि नहीं, बल्कि मानवीय संकट भी है।
समाधान की दिशा में संभावित प्रयास
1. परिवार की भूमिका
- बच्चों को बचपन से ही शिष्टाचार सिखाना।
- बुजुर्गों के अनुभवों को सम्मान देना।
- घर में "धन्यवाद", "कृपया", "माफ कीजिए" जैसे शब्दों का प्रयोग बढ़ाना।
2. शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी
- पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को पुनः स्थान देना।
- व्यवहारिक कार्यशालाएं और संवाद सत्र आयोजित करना।
- शिक्षकों को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना।
3. समाज और मीडिया की भूमिका
- सकारात्मक उदाहरणों को प्रचारित करना।
- सोशल मीडिया पर शिष्टाचार आधारित अभियान चलाना।
- सार्वजनिक स्थानों पर शिष्टाचार के संदेश देना।
4. युवाओं को प्रेरित करना
- उन्हें यह समझाना कि शिष्टाचार कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता की निशानी है।
- उन्हें नेतृत्व की भूमिका में सामाजिक मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करना।
- संवाद और व्यवहार में विनम्रता की पुनर्स्थापना
- विनम्रता कोई दिखावा नहीं, बल्कि एक आंतरिक गुण है।
- "नमस्ते" कहने से सम्मान बढ़ता है।
- "धन्यवाद" कहने से संबंध मजबूत होते हैं।
- "माफ कीजिए" कहने से अहंकार टूटता है।
यदि हम अपने संवाद में आदर, संवेदनशीलता और मर्यादा को पुनः स्थान दें, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
व्यावहारिक सुझाव
- सामाजिक अभियान: "शिष्टाचार सप्ताह" मनाया जाए।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म: सोशल मीडिया पर शिष्टाचार आधारित हैशटैग चलाए जाएँ।
- सांस्कृतिक आयोजन: विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिष्टाचार पर नाटक और कविताएँ प्रस्तुत हों।
- व्यक्तिगत संकल्प: हर व्यक्ति प्रतिदिन कम से कम तीन बार विनम्र शब्दों का प्रयोग करे।
एक नई शुरुआत की आवश्यकता
सामाजिक शिष्टाचार का लुप्त होता स्वरूप केवल सांस्कृतिक संकट नहीं, बल्कि मानवीय चुनौती है। यदि हम आज कदम नहीं उठाते, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक ऐसे समाज में जीने को मजबूर होंगी जहाँ संवेदनशीलता, आदर और सामूहिकता केवल किताबों में रह जाएँगी।
इसलिए, आइए हम सब मिलकर इस दिशा में कार्य करें। अपने घर से शुरुआत करें, अपने व्यवहार में बदलाव लाएँ, और समाज को एक बार फिर वह गरिमा प्रदान करें जो उसे वास्तव में शोभा देती है।
"शिष्टाचार वह दीपक है जो अंधेरे में भी रास्ता दिखाता है। उसे बुझने न दें, बल्कि हर घर में जलाएँ।"
मनोज भट्ट, कानपुर....
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