"संयुक्त परिवार: एक लुप्तप्राय सामाजिक व्यवस्था"... "Joint Family: An Endangered Social System"

"एक फ्लैट-स्टाइल चित्र जिसमें दो संयुक्त परिवार पारंपरिक भोजन साझा कर रहे हैं—बाएं तरफ़ ग्रामीण पृष्ठभूमि में मिट्टी का घर, खेत और बैलगाड़ी; दाएं तरफ़ शहरी पृष्ठभूमि में अपार्टमेंट, पार्क और आधुनिक शहर"  "A flat-style illustration showing two Indian joint families sharing traditional meals—on the left, a rural backdrop with a mud house, fields, and bullock cart; on the right, an urban backdrop with apartments, a park, and a modern cityscape."
     संयुक्त परिवार ...एक लुप्तप्राय सामाजिक व्यवस्था 

वर्तमान समय में युवा पीढ़ी में इसकी प्रासंगिकता और पुर्नस्थापन की संभावनाएँ...

      भारतीय समाज की नींव सदियों से परिवार पर आधारित रही है। परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक सुरक्षा का केंद्र है। विशेषकर संयुक्त परिवार व्यवस्था...
 
      जिसने भारतीय समाज को एकजुट रखा। इसमें कई पीढ़ियाँ एक साथ रहती हैं, जिम्मेदारियाँ साझा करती हैं और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का सहारा बनती हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था सही मायने में सामाजिक ताना-बाना का आधार है

     लेकिन आधुनिकता, शहरीकरण और भौतिकतावादी प्रचार ने इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया। आज के समय में जब लोगों में मानसिक तनाव, अकेलापन और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है, संयुक्त परिवार का महत्व और भी बढ़ जाता है।  

     हमारी पिछली पीढ़ी इस व्यवस्था के महत्व को भली भांति बात समझती थी। किंतु वर्तमान पीढ़ी इस व्यवस्था के प्रति उदासीन दिखती है। जबकि आज की युवा पीढ़ी के लिए संयुक्त परिवार व्यवस्था ज्यादा प्रासंगिक है। 

    आज अधिकांश युवा दंपत्ति अलग अलग क्षेत्र में अपने अपने कार्य में व्यस्त रहते हैं, ऐसी स्थिति में उन्हें अपनी संतानों के पालन पोषण हेतु बहुत तरह के समझौते करने पड़ते हैं। जिसके कारण उनके बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा पर कई बार नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जो न समाज के हित में है और न ही राष्ट्र हित में।

तो चलिए इस व्यवस्था का संक्षेप में पूर्ण विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं।

संयुक्त परिवार क्यों धराशाई हुआ...?

   जब इसके महत्व की चर्चा करते है तो इस प्रश्न पर भी ध्यान देना होगा कि वे कौन से कारक थे जिसकी वजह से संयुक्त परिवार व्यवस्था आज अपनी अंतिम सांस गिन रहा है। इसे समझने के लिए निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना होगा कि क्यों यह अनुपयोगी व्यवस्था की परिभाषा में समाहित हो रही है।

आर्थिक कारण
  • शहरीकरण और नौकरी की तलाश में लोग गाँव से शहरों की ओर गए।  
  • आर्थिक स्वतंत्रता ने नई पीढ़ी को अलग रहने के लिए प्रेरित किया।  
  • संपत्ति विवाद और आय-व्यय की असमानता ने परिवारों को तोड़ा।  
सामाजिक कारण
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता की चाह बढ़ी।  
  • पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव, जहाँ न्यूक्लियर फैमिली को आधुनिक माना गया।  
  • शिक्षा और करियर की दौड़ ने परिवार को पीछे छोड़ दिया।  
राजनीतिक और नीतिगत कारण
  • औद्योगीकरण और सरकारी नीतियों ने शहरी जीवन को बढ़ावा दिया।  
  • ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कमी ने परिवारों को विभाजित किया।  
  • सरकारी योजनाएँ अक्सर व्यक्तिगत इकाई पर केंद्रित होती हैं, सामूहिक परिवार पर नहीं।  
भौतिकतावादी प्रचार
  • विज्ञापन और मीडिया ने व्यक्तिगत उपभोग को बढ़ावा दिया।  
  • "अपना घर, अपनी कार, अपनी दुनिया" जैसी सोच ने सामूहिकता को कमजोर किया।  
     उपरोक्त कारणों से संयुक्त परिवार व्यवस्था धीरे धीरे कमजोर होती चली जा रही है।

संयुक्त परिवार व्यवस्था का स्वरूप और महत्व

   जबकि संयुक्त परिवार व्यवस्था में रहने वालों को निम्न तरह के फायदे रहते है...
  • सामाजिक सुरक्षा: संकट के समय हर सदस्य को सहारा मिलता है।  
  • संस्कार और संस्कृति का संरक्षण: बुजुर्ग बच्चों को जीवन मूल्य सिखाते हैं।  
  • आर्थिक मजबूती: आय और खर्च साझा होने से स्थिरता आती है।  
  • भावनात्मक विकास: बच्चों को सहयोग, सहिष्णुता और नेतृत्व का अनुभव मिलता है।  
  • बुजुर्गों का सम्मान: उन्हें देखभाल और सम्मान मिलता है।  
 आज के समय में संयुक्त परिवार की प्रासंगिकता

    अब आज कल तो इस व्यवस्था का महत्व पहले से भी कहीं अधिक जरूरी प्रतीत होता है...
  • मानसिक स्वास्थ्य: अकेलेपन और तनाव से बचाव।  
  • आर्थिक स्थिरता: साझा संसाधनों से खर्च कम होता है।  
  • सांस्कृतिक निरंतरता: परंपराएँ जीवित रहती हैं।  
  • सामाजिक सुरक्षा: बच्चों और बुजुर्गों के लिए सुरक्षित वातावरण।  
सुधार और पुनःस्थापन के उपाय

      संयुक्त परिवार व्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी नीतियों की भूमिका एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि संयुक्त परिवार व्यवस्था को नए एवं वृहद रूप से स्थायित्व देना है तो सरकारी नीतिगत समर्थन में निम्न उपाय शामिल किए जाने चाहिए, जैसे...
  • संयुक्त परिवारों को टैक्स में छूट दी जा सकती है।  
  • बड़े परिवारों के लिए सामूहिक आवास योजनाएँ बनाई जा सकती हैं।  
  • सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ: बुजुर्गों और बच्चों के लिए सामूहिक लाभ योजनाएँ लागू हों, आदि...
किंतु सिर्फ उपरोक्त सुझावों को अमल में लाने से ही काम नहीं बनेगा। संयुक्त परिवार के मुखिया और उनके सदस्यों की  भूमिकाओं का स्पष्ट निर्धारण कर हर सदस्य की जिम्मेदारी और अधिकार तय होंने चाहिए। तभी इस व्यवस्था को नए सिरे से स्थापित किया जा सकेगा, जैसे...
  • आर्थिक पारदर्शिता
  • डिजिटल माध्यमों से आय-व्यय का साझा लेखा-जोखा रखा जाए।  
  • निजता का सम्मान
  • बड़े घरों या अपार्टमेंट्स में अलग-अलग निजी स्पेस हों।
  • संवाद और सहमति
  • परिवार के निर्णय सामूहिक चर्चा से हों।  
  • शिक्षा और तकनीक का उपयोग
  • बच्चों की पढ़ाई और करियर में सामूहिक सहयोग हो।  
  • सांस्कृतिक गतिविधियाँ
  • त्योहार और सामाजिक कार्य परिवार मिलकर निभाए।  
संयुक्त परिवार व्यवस्था को निम्न उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है...

ग्रामीण भारत: कई गाँवों में संयुक्त परिवार अब भी कायम हैं, जहाँ खेती और संसाधन साझा होते हैं।  

शहरी भारत: महानगरों में अपार्टमेंट संस्कृति ने संयुक्त परिवार को नया रूप दिया है, "क्लस्टर फैमिली"।   
    
    दोनों क्षेत्रों में बुजुर्गों की देखभाल और बच्चों की शिक्षा में संयुक्त परिवार की अहम भूमिका, सहयोगी साबित होती रही है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि आज के समाज में सामाजिक सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग और सांस्कृतिक संरक्षण का पुनः सबसे मजबूत आधार हो सकती है।
 
    अंत में निष्कर्ष ये निकलता है कि संयुक्त परिवार व्यवस्था पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, बल्कि कमजोर हुई है। यदि इसमें निजता, पारदर्शिता और आधुनिक जीवनशैली का संतुलन जोड़ा जाए तो यह व्यवस्था पुनः जीवित हो सकती है। 

   निश्चय ही सामाजिक ताना-बाना की एक सुदृढ़ और सुंदर तस्वीर उभर सकती है। और इसके सबसे बड़ा लाभ वर्तमान पीढ़ी को मिलेगा।

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उपरोक्त लेख की रचना करने से पूर्व, लेखक द्वारा भारतीय परिवार एवं सामाजिक संरचना, संयुक्त परिवार की वर्तमान समाज में भूमिकाएँ और बदलते भारत में संयुक्त से एकल परिवार तक के विषय वस्तु पर गहन चिंतन करने के पश्चात ही  लेख में संक्षिप्त रूप से सभी प्रासंगिक तत्वों को शामिल करने की एक कोशिश की गई है...🙏
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मनोज भट्ट कानपुर ...

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