उद्देश्य से भटकती सोशल मीडिया "ग्रुप्स" संरचनाएँ: एक चिंतन | The Drift of Social Media Groups from Purpose: A Reflection
उद्देश्य से भटकती सोशल मीडिया "ग्रुप्स" संरचनाएँ...एक सामाजिक चिंतन
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने संवाद, अभिव्यक्ति और सामाजिक जुड़ाव के नए द्वार खोल दिए हैं। विशेष रूप से "ग्रुप्स", चाहे वे व्हाट्सएप, फेसबुक, टेलीग्राम या अन्य प्लेटफॉर्म्स पर हों।
शुरुआत में तो ये ग्रुप्स, सामाजिक जागरूकता, ज्ञान-विज्ञान का विनिमय और भावनात्मक जुड़ाव के सशक्त माध्यम थे। परंतु समय के साथ इनकी संरचना और उद्देश्य में निम्न स्तर तक की गिरावट दिखती है।
परिवारिक और सामाजिक ताना-बाना के लिए चेतावनी भी। जो "डिजिटल संस्कृति" की गिरती गुणवत्ता का संकेत तो देता ही है, साथ ही हमारी "मूल सामाजिक संस्कृति" के प्रति चिंताजनक भी है।
प्रारंभिक उद्देश्य: संवाद और समरसता
अधिकांश सोशल मीडिया ग्रुप्स की शुरुआत किसी सकारात्मक उद्देश्य से होती है, जिसका उद्देश्य....
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, तकनीकी सहायता, साहित्यिक विमर्श आदि पर ज्ञान साझा करना।
- पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा या सामाजिक सुधार से जुड़े विषय में सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करना।
- रिश्तों को बनाए रखने और भावनात्मक जुड़ाव के लिए और पारिवारिक व सामाजिक सरोकारों के विषयों पर संवाद कायम रखना।
- सबसे प्रमुख, मित्र मंडली को आपस में (चाहे वे कितने भी दूरस्थ हों) जोड़ कर अपनी मित्रता को जीवंत बनाए रखना,
परंतु जैसे-जैसे सदस्य बढ़ते हैं, नियंत्रण ढीला पड़ता है, ग्रुप्स का मूल स्वरूप बदलने लगता है और देखते ही देखते अधिकांश ग्रुप्स में आपसी सद्भावना, कब नफरत की बयार में बह जाती है यह सब अनुभव करते हैं।
विचलन के प्रमुख चरण: कुछ जिम्मेदार कारक
यदि ग्रुप्स में विकृत होते माहौल के कारणों पर विचार करें तो निम्न तत्व सामने आते हैं।
1. सदस्यों की अनियंत्रित वृद्धि...
जब ग्रुप में किसी भी व्यक्ति को जोड़ा जा सकता है, बिना पृष्ठभूमि या उद्देश्य की समझ के, तो संवाद का स्तर गिरना स्वाभाविक है।
2. विषय से भटकाव...
संक्षेप में देखा जाए तो, साहित्यिक ग्रुप में राजनीतिक बहस, स्वास्थ्य ग्रुप में मजाकिया मीम्स या सामाजिक चेतना ग्रुप में व्यक्तिगत प्रचार, यह सब उद्देश्य से भटकाव के संकेत हैं।
3. राजनैतिक और धार्मिक चर्चाएं...
कुछ निहितार्थ तत्व तथाकथित विकृति मानसिकता वाले सदस्य, कृत्रिम बनावटी संदेशों और वीडियो के माध्यम से सोशल मीडिया ग्रुप्स को नफरती युद्धक क्षेत्र में बदल कर रख देते हैं। जिसके कारण कुछ सदस्य स्वयं ग्रुप छोड़ देते हैं।
4. अमर्यादित भाषा और व्यवहार...
सबसे महत्वपूर्ण तत्व, जब आपसी संवाद में अपशब्द, कटाक्ष, या व्यक्तिगत हमले शामिल हो जाते हैं, तो निःसंदेह वह समूह की गरिमा को नष्ट कर देता है।
5. प्रशासनिक निष्क्रियता...
उस पर यदि एडमिन निष्क्रिय हो जाए, तो ग्रुप अराजकता का शिकार हो जाता है। और यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी सार्वजनिक स्थल पर कोई देखरेख न हो।
डिजिटल अराजकता: एक सामाजिक संकट
यह समस्या केवल ग्रुप्स तक सीमित नहीं है। यह सोशल मीडिया के "सामाजिक ताना-बाना" पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव की ओर संकेत करती है। इसे कुछ निम्नलिखित आधार पर भी समझा जा सकता है...
- सूचना का अवमूल्यन-- जब हर कोई विशेषज्ञ बन जाए, और तथ्यहीन जानकारी फैलाए, तो सत्य और ज्ञान का महत्व घटता है।
- भावनात्मक थकान-- निरंतर अनावश्यक संदेशों, विवादों और नकारात्मकता से मानसिक थकान उत्पन्न होती है।
- सामाजिक ध्रुवीकरण-- ग्रुप्स में पक्ष-विपक्ष की लड़ाई, जाति-धर्म आधारित बहसें और दुष्प्रचार, ये परिवार और समाज को बाँटने एवं आपसी वैमनस्यता उत्पन्न करने का प्रमुख कार्य करती हैं।
सुलभ शौचालय से तुलना: एक दृष्टिकोण...
जिस प्रकार भारत में जनकल्याण हेतु निर्मित सुलभ शौचालयों का उद्देश्य था, स्वच्छता, सुविधा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना, उसी प्रकार सोशल मीडिया ग्रुप्स का उद्देश्य भी था। संवाद, सहयोग और सामाजिक ताना-बाना में समरसता का अभिनव।
परंतु जैसे "सुलभ शौचालय", देखरेख के अभाव में गंदगी और अव्यवस्था के केंद्र बन गए, ठीक वैसे ही अनेक डिजिटल सोशल मीडिया ग्रुप्स भी आज "वर्चुअल मल-त्याग" के स्थल बन चुके हैं।
यह तुलना कठोर लग सकती है, परंतु यह यथार्थ है। जब कोई भी, कभी भी, कुछ भी पोस्ट कर देता है, बिना विषय की गंभीरता, भाषा की मर्यादा या समूह के उद्देश्य की परवाह किए, तो वह "डिजिटल प्रदूषण"ही है। इसे और क्या संज्ञा दी जाए।
समाधान की दिशा
चलिए अब इस गंभीर सामाजिक विषय पर चिंतन की दिशा को समाधान की ओर बढ़ाते हैं, जिसमें...
1. स्पष्ट उद्देश्य और नियमावली
हर ग्रुप को अपने उद्देश्य को एक नियमावली के अनुसार स्पष्ट एवं सख्त रूप से परिभाषित करना चाहिए। जैसे...
- इस ग्रुप में केवल पूर्व निर्धारित विषय वस्तु पर ही संदेश साझा होंगी।
- कोई भी पोस्ट करने से पहले विषय की प्रासंगिकता पर ध्यान दें।
- व्यक्तिगत प्रचार या अपशब्दों की अनुमति नहीं होगी।
2. सक्रिय एडमिन और मॉडरेशन
ग्रुप्स के आकार के अनुसार एडमिन की संख्या, साथ ही उनके द्वारा सक्रिय जिम्मेदारी का निर्वाहन होना चाहिए जो...
- नियमित रूप से पोस्ट्स की समीक्षा करें
- नियमों का उल्लंघन करने वालों को चेतावनी दे या निष्कासन करें
- नए सदस्यों को जोड़ने से पहले, पृष्ठभूमि की जांच करें
3. संवाद की मर्यादा और संवेदनशीलता
नैतिकता को ध्यान रख कर ही हर सदस्य अपनी भूमिका से एक प्रभावशाली स्तर पर ग्रुप निर्माण की भूमिका निभाए...
- भाषा की गरिमा बनाए रखें।
- असहमति हो तो तर्क से बात करें, कटाक्ष से नहीं।
- भावनात्मक विषयों पर संवेदनशीलता बरतें।
4. डिजिटल उपवास और आत्मनिरीक्षण
ग्रुप सदस्यों के लिए एक आचार संहिता होनी चाहिए,जैसे...
- सप्ताह में एक दिन सोशल मीडिया से विराम लें।
- सोचें कि क्या हम जो साझा कर रहे हैं, वह समूह के उद्देश्य के अनुरूप है ?
एक वैकल्पिक दृष्टिकोण: "डिजिटल स्वच्छता अभियान"
जैसे भारत में "स्वच्छ भारत अभियान" चला, वैसे ही हमें "डिजिटल स्वच्छता अभियान" की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत एडमिन द्वारा...
- ग्रुप्स की सफाई-- अनावश्यक पोस्ट्स हटाना।
- सदस्यता की समीक्षा-- निष्क्रिय या विवादास्पद सदस्यों को हटाना।
- उद्देश्य की पुनर्पुष्टि-- समय-समय पर ग्रुप के मूल उद्देश्य की याद दिलाना।
"डिजिटल अराजकता" कुछ तथ्य...
👉 एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 68% सोशल मीडिया उपयोगकर्ता मानते हैं कि ग्रुप्स में अनियंत्रित सामग्री और विवादों के कारण वे मानसिक थकान का अनुभव करते हैं, और 42% ने ऐसे ग्रुप्स को म्यूट या छोड़ने का निर्णय लिया है।
"डिजिटल स्वच्छता अभियान"
👉 यदि प्रत्येक ग्रुप एडमिन महीने में एक बार "डिजिटल सफाई दिवस" मनाए, तो यह न केवल संवाद की गुणवत्ता बढ़ाएगा, बल्कि सदस्यता में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा।
गरिमा की पुनर्स्थापना
सोशल मीडिया ग्रुप्स केवल टेक्स्ट, इमेज और वीडियो का आदान-प्रदान नहीं हैं। वे डिजिटल समाज के प्रतिबिंब हैं। यदि हम इन्हें गरिमामय, उद्देश्यपूर्ण और संवेदनशील बनाए रखें, तो ये समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।
अन्यथा, ये ग्रुप्स केवल "वर्चुअल कचरे के ढेर" बनकर रह जाएंगे, जहाँ कोई भी, कभी भी, कुछ भी "मल त्याग" कर देता है और विरोध करने पर वैसा ही होता है, जो "सार्वजनिक शौचालयों" में होता है।
और अंत में उपेक्षा, अपमान और अंततः पलायन...
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अंतिम विनम्र निवेदन...🙏
यदि इस लेख में प्रयुक्त प्रतीक चित्र या विचारों से किसी को ठेस पहुँची हो, तो वह अनजाने में हुआ है। उद्देश्य केवल सामाजिक जागरूकता और डिजिटल गरिमा की पुनर्स्थापना है।
अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें...🙏
आपकी टिप्पणी मेरे लिए मार्गदर्शन होगी। आपके अनुभव और विचार ही इस “सामाजिक ताना-बाना” को जीवंत बनाते हैं।
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मनोज भट्ट कानपुर ...
